संजय गुप्त। पिछले दिनों पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की प्रक्रिया में नियुक्त न्यायिक अधिकारियों को जिस तरह घेराव कर घंटों तक बंधक बनाए रखा गया, उससे कानून के शासन को अराजकता की सीधी चुनौती मिलती हुई दिखी। यह मामला इतना गंभीर था कि कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पत्र का संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश ने दखल दिया और देर रात घटना का जायजा लेने के साथ ही बंगाल सरकार के खिलाफ बहुत सख्त टिप्पणियां कीं।

उन्होंने दो टूक कहा कि राज्य में कानून व्यवस्था चरमरा गई है। उन्होंने चुनाव आयोग से मामले की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराने के निर्देश दिए। चुनाव आयोग ने जांच एनआइए को सौंप दी है। तीन महिला अफसरों समेत सात न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाने वाले कुछ राजनीतिक लोगों को गिरफ्तार भी किया गया है।

आश्चर्य इस पर है कि तृणमूल कांग्रेस के कुछ नेता सुप्रीम कोर्ट की ओर से तय की गई व्यवस्था को चुनौती देने वाली अराजकता का यह कहकर बचाव कर रहे हैं कि लोग इसलिए नाराज थे, क्योंकि कथित तौर पर वोटर लिस्ट से उनके नाम हटा दिए गए थे। यदि एक क्षण के लिए इसे सही मान लें तो क्या किसी का नाम वोटर लिस्ट से कट जाएगा तो वह खुली अराजकता करेगा? ममता बनर्जी ने मालदा की घटना से पल्ला झाड़ने की जो कोशिश की, उस पर हैरानी नहीं। वह हर बार ऐसा ही करती हैं।

बंगाल में एसआईआर के खिलाफ अर्से से अराजक प्रदर्शन हो रहे हैं, क्योंकि तृणमूल कांग्रेस यह दुष्प्रचार कर रही है कि इस प्रक्रिया का उद्देश्य उसके समर्थकों के वोट काटना है। वे यह कुप्रचार तभी से कर रही हैं, जबसे बंगाल में एसआईआर शुरू हुआ। एसआईआर के खिलाफ उनकी ओर से बार-बार सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया और उलटे-सीधे आरोपों के साथ चुनाव आयोग को बदनाम किया गया।

शीर्ष न्यायालय ने उनके आरोप निराधार पाकर एसआईआर जारी रखने के आदेश दिए। इसके बाद ममता प्रशासन ने चुनाव आयोग का असहयोग करना शुरू कर दिया। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर प्रक्रिया न्यायिक अधिकारियों की निगरानी में कराने का अभूतपूर्व आदेश दिया। यह आदेश यही बताता है कि सुप्रीम कोर्ट का राज्य के शासन-प्रशासन पर भरोसा नहीं।

आखिर ममता सरकार चुनाव आयोग को उसका संवैधानिक काम क्यों नहीं करने दे रही है और वह भी तब जब सुप्रीम कोर्ट उसके काम में कोई खोट नहीं देख रहा है? चूंकि सुप्रीम कोर्ट एसआईआर को उचित मान रहा है, इसलिए तृणमूल कांग्रेस चुनाव आयोग को बदनाम करने के लिए यह भी माहौल बना रही है कि वह वही कर रहा है, जो केंद्र सरकार चाह रही है। यह वही आरोप है, जो बिहार में एसआईआर के समय खूब उछाला गया, पर इससे विपक्षी दलों का नुकसान ही हुआ।

यदि एसआईआर पर सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग को सही पा रहा है तो इसका यह अर्थ नहीं कि उस पर केंद्र सरकार हावी हो गई है। बिहार के बाद बंगाल समेत 12 राज्यों में एसआईआर की प्रक्रिया जारी है। इन सभी राज्यों में वोटरों के नाम कटे हैं, पर वे उनके हैं, जो अन्यत्र चले गए या फिर जिनका निधन हो गया अथवा जिनका नाम वोटर लिस्ट में दो-दो बार था।

न जाने क्यों तृणमूल कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल यह समझ नहीं पा रहे हैं कि यदि लंबे अंतराल बाद एसआईआर होगा तो वोटर लिस्ट में कुछ नाम जुड़ेंगे तो कुछ उससे कटेंगे? एसआईआर कई गैर-भाजपा शासित राज्यों में भी हो रहा है, पर उसका सबसे अधिक विरोध बंगाल में इसलिए हो रहा है, क्योंकि तृणमूल कांग्रेस और अन्य राजनीतिक तत्व उसके विरोध में हद से ज्यादा आगे चले गए हैं। लगता है तृणमूल कांग्रेस एसआईआर का विरोध इसलिए कर रही है, ताकि वह अपने 15 वर्षों के शासन के खिलाफ उभरी एंटी इनकंबेंसी से लोगों का ध्यान हटा सके।

ममता बनर्जी वाम दलों को परिवर्तन के नारे के साथ बेदखल कर सत्ता में आई थीं, पर धीरे-धीरे उन्होंने वही तौर-तरीके अपना लिए जो वाम दलों ने अपना रखे थे। यह एक विडंबना है कि बंगाल में जो भी सत्ता में आता है, वह अराजकता का सहारा लेने लगता है। इसके चलते अन्य दलों के बाहुबली सत्ताधारी दल में शामिल हो जाते हैं। चूंकि बंगाल के सत्तारूढ़ दल अराजकता का सहारा लेते हैं, इसलिए यहां चुनाव के पहले भी हिंसा होती है, चुनाव के दौरान भी और चुनाव के बाद भी। इस बार भी आशंका है कि पहले की तरह इस बार भी यहां हिंसा हो सकती है। ध्यान रहे कि पिछले चुनावों के बाद की हिंसा इतनी भयानक थी कि कलकत्ता उच्च न्यायालय ने उसकी जांच सीबीआइ से कराने का फैसला लिया था। इस बार चुनावी हिंसा की आशंका के चलते ही चुनाव आयोग ने यह असाधारण फैसला लिया कि राज्य में चुनाव बाद भी अर्धसैनिक बल तैनात रहेंगे।

चूंकि चुनावों के दौरान बंगाल में हिंसा होती ही है, इसलिए यहां के पुलिस प्रशासन पर भी सवाल उठते हैं। ये सवाल इसलिए अधिक उठते हैं, क्योंकि राज्य में नौकरशाही का राजनीतिकरण हो चुका है। इसी कारण चुनाव आयोग ने बंगाल के डीजीपी, गृह सचिव समेत तमाम अधिकारियों का तबादला किया। बंगाल की कानून व्यवस्था सदैव सवालों के घेरे में रहती है। इसका कारण यही है कि ममता बनर्जी ने उसे सुधारने के लिए आवश्यक कदम नहीं उठाए। भले ही सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल की कानून व्यवस्था को लेकर सख्त टिप्पणियां की हों, पर यदि ममता फिर से सत्ता में लौटती हैं तो कानून व्यवस्था जस की तस रहने की ही आशंका है।

इसमें संदेह है कि सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियों और चुनाव आयोग की सक्रियता से बंगाल पुलिस प्रशासन का रवैया बदलेगा। भारत के लोकतंत्र का यह एक स्याह पक्ष है कि राज्य सरकार के अधीन रहने वाली पुलिस कई बार सत्ताधारी दल के एजेंट की तरह काम करने लगती है और सत्तारूढ़ राजनीतिक मशीनरी का अंग सा बन जाती है। ऐसा तब और होता है, जब किसी राज्य में कोई दल लंबे समय तक शासन में रहता है। शासन-प्रशासन में स्वार्थ प्रेरित मिलीभगत से अराजकता के साथ भ्रष्टाचार को भी बल मिलता है। आखिर हमारे राजनीतिक दल कब यह समझेंगे कि नौकरशाही का राजनीतिकरण लोकतंत्र के लिए एक बहुत बड़ा खतरा है?

Sanjay Gupta Sir

[लेखक दैनिक जागरण के प्रधान संपादक हैं]