संपादकीय: जन विश्वास विधेयक, अमल का रास्ता साफ
जन विश्वास विधेयक अब कानून बन गया है, जो छोटी-मोटी गलतियों पर जेल की सजा को आर्थिक दंड से बदलेगा। यह 79 केंद्रीय कानूनों में संशोधन कर 700 से अधिक छोटे अपराधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करता है, जिससे जीवन और व्यापार सुगमता बढ़ेगी
HighLights
छोटी गलतियों पर जेल की जगह अब आर्थिक दंड लगेगा।
79 केंद्रीय कानूनों में 700 से अधिक अपराध decriminalized।
व्यापार और जीवन सुगमता को बढ़ावा मिलेगा, न्यायिक बोझ घटेगा।
लोकसभा के बाद राज्यसभा से भी जन विश्वास संशोधन विधेयक पारित होने से कानून के रूप में उसके अमल का रास्ता साफ हो गया। इसके माध्यम से उस व्यवस्था को विदा देने का जतन किया गया है, जिसमें छोटी-छोटी गलतियों या सामान्य नियम-कानूनों के उल्लंघन पर जेल की सजा का प्रविधान था। अब ऐसा होने पर आर्थिक दंड लगेगा।
जन विश्वास विधेयक का मूल उद्देश्य जीवन सुगमता के साथ व्यापार सुगमता को बढ़ावा देना और न्याय व्यवस्था को ज्यादा मानवीय एवं व्यावहारिक बनाना है। इसी कारण प्रधानमंत्री ने इस विधेयक के पारित होने पर यह आशा व्यक्त की कि इसके जरिये भरोसे पर आधारित व्यवस्था का निर्माण होने के साथ आम नागरिक सशक्त बनेंगे।
चूंकि इस विधेयक के जरिये 79 केंद्रीय कानूनों के 784 प्रविधानों में संशोधन किए गए हैं और 700 से अधिक छोटे अपराधों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया गया है, इसलिए मुकदमों का बोझ हटेगा और न्यायिक तंत्र पर दबाव कम होगा। अब ड्राइविंग लाइसेंस की अवधि खत्म होने पर भी वह 30 दिन तक वैध रहेगा और राष्ट्रीय राजमार्ग पर जाम लगाने पर सजा के स्थान पर जुर्माने का प्रविधान होगा।
इसी तरह अन्य अनेक मामलों में ऐसा होगा। इनमें से कई मामले कारोबारियों से भी जुड़े हैं, जैसे पहले ड्रग्स एवं कास्मेटिक नियमों के उल्लंघन पर जेल हो सकती थी, लेकिन अब केवल जुर्माना लगेगा। जो छोटे कारोबारी प्रायः जटिल नियम-कानूनों के अनचाहे उल्लंघन के कारण दंडित होने के दबाव में रहते थे, वे अब भयमुक्त होंगे।
वास्तव में कानून का शासन ऐसा होना चाहिए, जिसमें मामूली गलती या किसी गफलत या अनजाने में की गई भूल सजा का कारण नहीं बननी चाहिए। अब जब जन विश्वास विधेयक से हालात में व्यापक बदलाव की उम्मीद की जा रही है, तब यह आवश्यक हो जाता है कि इस विधेयक के प्रविधानों से आम जनता को अवगत कराया जाए, ताकि वह अधिकतम लाभ उठा सके और शोषण एवं भ्रष्टाचार से भी बच सके।
ध्यान रहे आम लोग सशक्त तब होते हैं, जब वे नियम-कानूनों से भली तरह अवगत होते हैं। जनता को बदले हुए नियम-कानूनों से परिचित कराने का काम सरकार को करना चाहिए। इसी के साथ उसे इसे लेकर सावधान रहना होगा कि छोटे अपराधों में जेल भेजने वाले प्रविधानों की जगह चेतावनी देने और जुर्माना लगाने वाली नई व्यवस्था से समाज में ऐसा कोई संदेश न जाए कि नियम-कानूनों के उल्लंघन पर जुर्माना देकर बचा जा सकता है।
यदि जुर्माना देकर नियम-कानूनों को हल्के में लेने की प्रवृत्ति बढ़ी तो इस विधेयक का उद्देश्य ही व्यर्थ हो जाएगा। लोगों को यह समझना आवश्यक है कि अधिकारों के साथ कर्तव्यों के पालन से ही कोई राष्ट्र प्रगति पथ पर तेजी से आगे बढ़ता है।












