विचार: बंगाल में मुस्लिम मतों का रुझान
बंगाल के मुसलमानों के पास तृणमूल कांग्रेस के समानांतर एक विकल्प उपलब्ध हो गया है। हुमायूं कबीर के साथ कुछ प्रभावी मुसलमान नेता और चेहरे आ गए हैं। कुल मिलाकर देखें तो मुस्लिम राजनीति को लेकर सामूहिक सोच तथा माहौल में पिछले तीन चुनावों से अंतर है।
HighLights
ममता बनर्जी मुस्लिम वोटों को एकजुट रखने का प्रयास कर रही हैं।
हुमायूं कबीर और ओवैसी नए मुस्लिम विकल्प के रूप में उभरे।
मुस्लिम बहुल सीटों पर तृणमूल को चुनौती मिल सकती है।
अवधेश कुमार। पश्चिम बंगाल चुनाव का एक प्रमुख विश्लेषण हमेशा मुस्लिम मतों पर केंद्रित रहता है। कई वर्षों से राज्य की सत्ता पर काबिज मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की निरंतर विजय में मुस्लिम मतों की प्रमुख भूमिका मानी जाती रही है। 2011 की जनगणना के अनुसार बंगाल की आबादी करीब 9.13 करोड़ थी, जिसमें मुस्लिम लगभग 2.5 करोड़ थे। इस समय बंगाल की कुल जनसंख्या 10.5 करोड़ से ऊपर होगी, जिसमें मुस्लिम तीन करोड़ से अधिक हो सकते हैं। बंगाल में मुस्लिम बहुल जिले हैं मुर्शिदाबाद-66.3 प्रतिशत, मालदा-51.3, उत्तर दिनाजपुर-50, बीरभूम-37, दक्षिण 24 परगना-35.5 और नादिया-26.7 प्रतिशत।
यदि भाजपा जबरदस्त टक्कर देने के बावजूद पिछले विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की सत्ता को नहीं हिला पाई तो उसका एक कारण मुस्लिम वोट भी थे। मुर्शिदाबाद के बेलडांगा में बाबरी मस्जिद की नींव रखने वाले पूर्व तृणमूल नेता हुमायूं कबीर ने असदुद्दीन ओवैसी की एआइएमआइएम से गठबंधन कर उसे आठ सीटें दी हैं। हुमायूं कबीर ने 182 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी के साथ सौ से ज्यादा सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार उतारने की घोषणा की है। पिछली बार फुरफुरा शरीफ के इमाम ने भी अपनी पार्टी बनाकर कांग्रेस और वाम मोर्चा के साथ गठबंधन किया था, पर उनका भी प्रभाव नहीं पड़ा और मुसलमान कुल मिलाकर तृणमूल के साथ ही गए। मुसलमान भाजपा को हराने के लिए मतदान करते हैं।
प्रश्न है कि इस बार मुस्लिम मतों की प्रवृत्ति किस ओर रहेगी? अगर पिछले विधानसभा चुनाव को आधार बनाएं तो मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर, बीरभूम और साउथ 24 परगना जैसे जिलों में 85 ऐसी सीटें हैं, जिन पर मुस्लिम जनसंख्या 35 प्रतिशत से ज्यादा है। इनमें से 75 सीटें तृणमूल के पास हैं। जितनी आक्रामक होकर तृणमूल मुसलमानों के साथ खड़ी होती है, उससे उनका ध्रुवीकरण उसके पक्ष में बनता है। मुर्शिदाबाद में पिछले वर्ष हिंदू विरोधी भयानक दंगे में जब लोग पलायन करने को मजबूर थे, तब ममता कोलकाता में इमामों और मौलवियों की सभा में दंगों के लिए भाजपा और आरएसएस को दोषी ठहरा रही थीं। बंगाल में सीएए विरोधी आंदोलन के समय भी भारी हिंसा हुई थी, पर ममता सरकार ने उपद्रवियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई नहीं की।
एनआरसी और सीएए का भय दिखाकर ममता मुसलमानों को आभास दिलाती रहती हैं कि उनके सत्ता में रहने से ही वे सुरक्षित हैं। मुसलमानों को साथ रखने के लिए भाजपा का भय उनका बहुत बड़ा अस्त्र है। 2011 के चुनाव में ममता ने सच्चर कमेटी की रिपोर्ट लागू करने का वादा किया था। दो साल बाद उन्होंने घोषणा की कि रिपोर्ट का 90 प्रतिशत हिस्सा लागू किया जा चुका है। शायद ही किसी राज्य सरकार ने इतनी त्वरित गति से ऐसा किया हो। हर चुनाव में ममता मुसलमानों के लिए कुछ नई घोषणाएं करती हैं। आचार संहिता लागू होने से दो दिन पहले ही उन्होंने इमामों का भत्ता बढ़ाने की घोषणा की। मुस्लिम छात्र-छात्राओं की स्कालरशिप के लिए वे विशेष योजना चलाती हैं। चुनाव से पहले अंतरिम बजट में भी उनकी सरकार ने अल्पसंख्यक मामलों के लिए 5,700 करोड़ रुपये जारी किए।
मुसलमानों के सामने यह साफ है कि अगर तृणमूल हारती है तो सत्ता में भाजपा आएगी। इससे मुस्लिम मतों के तृणमूल के साथ जाने के ही संकेत मिलते हैं, किंतु हुमायूं कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी बंगाल में एक नया प्रयोग है। बाबरी मस्जिद की नींव रखते समय एकत्रित भारी भीड़ से माहौल भी बनता दिखा था। कबीर मुसलमानों के बीच अपने चेहरे के रूप में उभर रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस ने अपने कुल 291 उम्मीदवारों में 47 मुस्लिम उतारे हैं। यानी करीब 18 प्रतिशत। पिछली बार की तरह ममता ने मुस्लिम प्रभाव वाले क्षेत्रों से भी हिंदू प्रत्याशी उतारे हैं। वस्तुत: ममता ने मुसलमानों को बहुत ज्यादा टिकट कभी नहीं दिए। इसे हुमायूं कबीर, ओवैसी और अन्य मुस्लिम नेता मुद्दा बना रहे हैं। कहना कठिन है कि यदि हुमायूं कबीर का गठबंधन सौ से ऊपर सीटों पर मुस्लिम प्रत्याशी खड़ा करता है तो उसका कुछ तो असर होगा ही। हुमायूं कबीर और ओवैसी वक्फ संशोधन कानून को मुद्दा बना रहे हैं, जिसे कभी लागू न करने की घोषणा करने वाली ममता ने अंततः उसे चुपचाप लागू कर दिया। कांग्रेस सहित कई दलों के नेता हुमायूं कबीर की पार्टी में शामिल हो रहे हैं। इसका भी कुछ असर हो सकता है।
पिछले कुछ समय से मुस्लिम मतों में यह प्रवृत्ति देखने को मिल रही है कि अगर उनके सामने कोई मुसलमान विकल्प है तो वे उसके पक्ष में जाते हैं। बिहार में ओवैसी की पार्टी को पांच सीटों पर विजय तथा कई पर अच्छी टक्कर का अन्य कोई कारण नहीं। महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनाव में एआइएमआइएम ने कई जगह सफलता हासिल की तथा नई बनी इस्लाम पार्टी मालेगांव में बहुमत में पहुंच गई। यह प्रवृत्ति धीरे-धीरे देशव्यापी हो रही है। 15 साल से चल रही राज्य सरकार से किसी न किसी तरह का असंतोष स्वाभाविक है। बंगाल के मुसलमानों के पास तृणमूल कांग्रेस के समानांतर एक विकल्प उपलब्ध हो गया है। हुमायूं कबीर के साथ कुछ प्रभावी मुसलमान नेता और चेहरे आ गए हैं। कुल मिलाकर देखें तो मुस्लिम राजनीति को लेकर सामूहिक सोच तथा माहौल में पिछले तीन चुनावों से अंतर है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)












