संजय गुप्त। दिल्ली के बहुचर्चित शराब घोटाले में सीबीआई की राऊज एवेन्यू कोर्ट की ओर से पूर्व मुख्यमंत्री एवं आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल और पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया समेत सभी 23 आरोपितों को बरी किया जाना जहां इन दोनों नेताओं और उनकी पार्टी के लिए एक बहुत बड़ी जीत है, वहीं जांच एजेंसी के साथ-साथ भाजपा के लिए बड़ा झटका है।

अदालत ने यह पाया कि पूरे मामले में कोई साजिश नहीं थी और सीबीआई ने केवल अनुमान के आधार पर षड्यंत्र की कहानी गढ़ी। विशेष जज ने अपने फैसले में यह भी कहा कि मैं पहली बार ऐसी चार्जशीट देख रहा हूं, जिसमें इतनी अधिक खामियां हैं। उन्होंने लापरवाह अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की भी बात कही।

जब केजरवाल सरकार नई आबकारी नीति लाई थी तो कांग्रेस-भाजपा ने इसे घोटाले का नाम दिया। इसके बाद उपराज्यपाल की पहल पर मामला दर्ज हुआ और जांच सीबीआई को सौंपी गई। इस दौरान ऐसे आरोप उछले कि आबकारी नीति के जरिये कुछ लोगों को अनुचित लाभ पहुंचाने से दिल्ली सरकार को दो हजार करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ।

इस मामले में सीबीआई के बाद ईडी ने भी दखल दिया, लेकिन सीबीआई का केस खारिज होने के बाद ईडी के मामले के भी खारिज होने के आसार हैं। इन दोनों जांच एजेंसियों ने इस कथित घोटाले को लेकर पर्याप्त साक्ष्य होने के दावे किए और फिर एक के बाद एक कई लोगों को गिरफ्तार किया। प्रमुख लोगों में पहले मनीष सिसोदिया गिरफ्तार हुए और फिर अरविंद केजरीवाल। दोनों को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल सकी।

हालांकि सीबीआई केजरीवाल, सिसोदिया और अन्य को बरी करने के फैसले के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट गई है, पर राऊज एवेन्यू कोर्ट के जज ने उसके खिलाफ जैसी टिप्पणियां की हैं, उनसे यह संदेह होता है कि कहीं सीबीआई ने मनमाने तरीके से तो जांच नहीं की? यही सवाल ईडी को लेकर भी है। ध्यान रहे कि न जाने कितने ऐसे मामले हैं, जिनमें सीबीआई प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट और ईडी प्रिवेंशन ऑफ मनी लांड्रिंग एक्ट के तहत मिली शक्तियों के सहारे नेताओं, कारोबारियों समेत अन्य अनेक लोगों को घपले-घोटालों के आरोप में गिरफ्तार कर लेती है और फिर उनमें से अधिकांश साक्ष्य के अभाव में बरी हो जाते हैं, लेकिन जब तक ऐसा होता है, तब तक संबंधित व्यक्ति की प्रतिष्ठा पर आंच आ चुकी होती है और उसकी भरपाई नहीं हो पाती।

इसीलिए राऊज एवेन्यू कोर्ट के जज ने कहा कि जब किसी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता बाधित हो जाती है तो उसके बरी होने के बाद भी वह सार्थक रूप से बहाल नहीं होती और अन्यायपूर्ण हिरासत से हुई क्षति की पूर्ति भी नहीं हो पाती। वास्तव में ऐसे लोगों को आर्थिक के साथ सामाजिक नुकसान भी उठाना पड़ता है। नेता भी नुकसान उठाते हैं, लेकिन बरी होने के बाद वे लोगों की हमदर्दी हासिल कर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश करते हैं।

उन्हें यह प्रचारित करने में आसानी होती है कि वे राजनीतिक बदले की कार्रवाई का शिकार हुए। इस पर हैरानी नहीं कि केजरीवाल ने ऐसा कहना शुरू कर दिया है। उन्हें नई राजनीतिक ऊर्जा मिली है और इसका असर आने वाले दिनों में पंजाब, गुजरात और दिल्ली की राजनीति में दिख सकता है। चूंकि आम आदमी पार्टी कांग्रेस के वोट में सेंधमारी करती है, इसलिए उसका चिंतित होना स्वाभाविक है।

अब यह आम बात है कि घपले-घोटालों के कई मामलों में सीबीआई के साथ ईडी भी जांच शुरू कर देती है। जब ईडी किसी को गिरफ्तार करती है तो उसे जमानत मिलना कठिन हो जाता है। कई बार जमानत इसलिए नहीं मिलती, क्योंकि सीबीआई और ईडी की ओर से इस पर जोर दिया जाता है कि जेल से बाहर आने पर आरोपित गवाहों को प्रभावित कर सकता है। कहना कठिन है कि राऊज एवेन्यू कोर्ट के फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट गई सीबीआई को क्या हासिल होगा, लेकिन जब तक हाई कोर्ट भिन्न निर्णय नहीं देता, तब तक भाजपा एवं मोदी सरकार को केजरीवाल और उनके साथियों की आलोचना का सामना करना होगा।

इसी के साथ सीबीआई और ईडी की भी किरकिरी होती रहेगी। आगे जो भी हो, यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि नेताओं के मामलों में राजनीतिक द्वेष के तहत भी कार्रवाई होती है और जांच एजेंसियों का दुरुपयोग होता है। इसी कारण एक बार सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को पिंजरे का तोता कहा था। एक ओर नेताओं-नौकरशाहों के भ्रष्टाचार के जिन मामलों की जांच सीबीआई या ईडी की ओर से की जाती है, उनमें से अधिकांश अदालत में ठहर नहीं पाते और दूसरी ओर यह देखने में आ रहा है कि उनके भ्रष्टाचार के मामले कम होने का नाम नहीं ले रहे हैं। यह समझना कठिन है कि जब सीबीआई अथवा ईडी किसी को गिरफ्तार करती हैं तो जो अदालतें उसे जेल भेजती हैं, रिमांड पर देती हैं या फिर जमानत देने से मना करती हैं, वही उन्हें बरी करने के नतीजे पर कैसे पहुंच जाती हैं? जेल भेजने का काम तो अदालतें ही करती हैं, न कि जांच एजेंसियां।

पिछले दिनों एनसीईआरटी की ओर से आठवीं की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक में न्यायपालिका के भ्रष्टाचार पर एक अध्याय को शामिल करने पर उसे सुप्रीम कोर्ट की फटकार का सामना करना पड़ा। सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी से इस पुस्तक को प्रतिबंधित भी करा दिया। इससे इनकार नहीं कि न्यायपालिका में जब-तब भ्रष्टाचार के मामले सामने आते हैं, पर नेताओं और नौकरशाहों के भ्रष्टाचार के मामलों की तो गिनती करना ही कठिन है। इसके चलते सरकार के इस संकल्प पर सवाल उठता है कि वह शासन-प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए प्रतिबद्ध है।

यह सही समय है कि सरकार अपनी इस प्रतिबद्धता पर गंभीरता दिखाए। इसी के साथ अब ऐसी व्यवस्था भी आवश्यक है कि सीबीआई और ईडी जैसी एजेंसियां बिना किसी ठोस साक्ष्य लोगों को मनमाने तरीके से गिरफ्तार न कर सकें और यदि उनके अधिकारी मनमानी करें तो उन्हें दंडित किया जाए, ताकि भ्रष्टाचार से लड़ने के नाम पर बदले की कार्रवाई न हो सके और भ्रष्टाचार से लड़ा भी जा सके। इस मामले में सरकार के साथ न्यायपालिका को भी विचार करना होगा। उसे यह देखना होगा कि उसके फैसले यथाशीघ्र आएं।

Sanjay Gupta Sir

[लेखक दैनिक जागरण के प्रधान संपादक हैं]