विचार: खामेनेई के बाद ईरान का भविष्य, बाहरी दबाव से प्रतिरोध और बढ़ेगा
इजरायल और अमेरिका के साझा हमले में ईरान के शीर्ष नेता खामेनेई की मौत के बाद ईरान के भविष्य पर विचार किया गया है। लेख बताता है कि बाहरी दबाव से सत्ता परिवर्तन मुश्किल है, क्योंकि ईरान की आंतरिक संरचना जटिल है।
HighLights
इजरायल-अमेरिका हमले में खामेनेई की मौत, ईरान में सत्ता परिवर्तन लक्ष्य।
ईरान की जटिल आंतरिक संरचना बाहरी दबाव का करेगी प्रतिरोध।
वास्तविक बदलाव आंतरिक उत्प्रेरणा से ही संभव, बाहरी हस्तक्षेप बढ़ाएगा अराजकता।
डॉ. मनिष दाभाडे। इजरायल ने अमेरिका के साथ साझा अभियान में ईरान पर हमला बोल ही दिया। हमले के शुरुआती दौर में ही ईरान के शीर्ष नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत से दोनों देशों ने अपने इरादे पूरी तरह जाहिर कर दिए थे। स्पष्ट है कि उन्होंने ईरान में विध्वंस ही नहीं, बल्कि सत्ता परिवर्तन की जिद को अपना लक्ष्य बना लिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तो ईरान की जनता का आह्वान तक कर दिया है कि अपने देश की कमान अपने हाथ में लीजिए और ऐसा मौका फिर पता नहीं कब मिले।
देखा जाए तो ईरान पर यह हमला किसी आसन्न खतरे से अधिक अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान के राजनीतिक गुणा-गणित, इजरायल की सुरक्षा चिंताओं और तथाकथित डोनरो सिद्धांत की आक्रामक महत्वाकांक्षाओं का परिणाम है। डोनरो सिद्धांत के जरिये ट्रंप अमेरिकी प्रभुत्व का व्यापक विस्तार करना चाहते हैं। साल की शुरुआत में वेनेजुएला में तख्तापलट और ग्रीनलैंड को लेकर कड़े तेवर इसी रणनीति का हिस्सा रहे हैं। इसी कड़ी में अब ईरान पर बड़ा हमला किया गया है।
अब अमेरिकी एजेंडा ईरान में सत्ता परिवर्तन का भले हो, लेकिन इतिहास साक्षी है कि जहां समाज, सेना और राज्य–सत्ता की जड़ें गहरी हों, वहां केवल बाहरी बमबारी से सत्ता की संरचना को नहीं बदला जा सकता। खामेनेई की मौत के संदर्भ में ट्रंप प्रशासन शीर्ष नेतृत्व के सफाए और वास्तविक सत्ता परिवर्तन के बीच के अंतर को या तो समझ नहीं पाया या फिर उसे अनदेखा कर रहा है। याद रहे कि ईरानी इस्लामी गणराज्य कोई एक व्यक्ति की तानाशाही नहीं, बल्कि समानांतर संस्थाओं वाला एक हाइब्रिड मॉडल है।
यह मॉडल सर्वोच्च नेता के ऊपर सैद्धांतिक वैधता के छत्र तले रिवोल्यूशनरी गार्ड यानी आईआरजीसी, बसीज मिलीशिया, गार्जियन काउंसिल, विशेषज्ञ सभा, न्यायपालिका और विशाल धार्मिक-आर्थिक ट्रस्टों के संजाल से मिलकर बनता है। यह राजनीतिक, आर्थिक एवं सामाजिक पहलुओं पर नियंत्रण रखते हुए दमन का सहारा भी लेता है। इस संरचना के एक सिरे को उड़ा देने भर से यह समाप्त नहीं होती, बल्कि और खतरनाक रूप भी ले लेती है।
वर्तमान परिस्थितियों में ईरान में जो संभावित परिदृश्य आकार लेते दिख रहे हैं, उसमें संभव है कि किसी प्रतीकात्मक धर्मगुरु को केंद्र में रखते हुए आईआरजीसी ही कमान अपने हाथ में ले। इस तरह मुल्ला-राज की जगह सैन्य-राज शुरू होगा और व्यवस्थागत तानाशाही जस की तस रहेगी। दूसरे परिदृश्य में संभव है कि आईआरजीसी के भीतर मजहबी ताकतों और प्रांतीय कमांडरों के बीच लंबी खींचतान और गुटीय संघर्ष की स्थिति बने, जिसमें अस्पष्ट सत्ता साझेदारी और हिंसक अस्थिरता कायम रह सकती है।
तीसरी स्थिति जनविद्रोह की भी दिखती है जिसमें जनवरी में हुए व्यापक प्रदर्शनों और अब खामेनेई की हत्या से उपजी भावनाओं के बल पर कोई नया राजनीतिक संतुलन बनाने की जुगत हो सकती है। हालांकि सांगठनिक ढांचे का अभाव और नेतृत्व के स्तर पर निर्वात से यह संभावना कमजोर ही दिखती है। चौथी स्थिति चारों तरफ अफरा-तफरी फैलने की भी हो सकती है। हालांकि इसके आसार अभी बहुत कम दिखते हैं, लेकिन यदि ऐसा हुआ तो क्षेत्रीय एवं वैश्विक व्यवस्था के लिए इसके परिणाम बहुत घातक होंगे।
पुराने अनुभव यही बताते हैं कि हवाई हमलों से परमाणु ठिकाने नष्ट किए जा सकते हैं, प्रतिद्वंद्वी सेना को निस्तेज किया जा सकता है, नेताओं की हत्या की जा सकती है, लेकिन राज्य की आंतरिक राजनीतिक संरचना को पूरी तरह नहीं बदला जा सकता। लीबिया को छोड़कर कोई उदाहरण याद नहीं आता, जहां केवल हवाई हमलों और सीमित जमीनी दखल से स्थिर एवं लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था स्थापित हुई हो। हालांकि आज वह भी अव्यवस्था का शिकार है। उसके उलट ईरान को देखें तो प्रतिरोध को लेकर उसका लंबा इतिहास रहा है।
वह अपेक्षाकृत साधन संपन्न भी है। जब 1980–88 के युद्ध में लाखों जानें गंवा कर भी उसने झुकने से इन्कार किया था तो क्या वह अब अपने शीर्ष नेता को मार गिराए जाने से समर्पण कर देगा? ईरानी समाज की अंतर्वस्तु भी कुछ और कहानी कहती है। 1979 के बाद पैदा हुई तीन चौथाई आबादी के लिए इस्लामी गणराज्य का अनुभव राजनीतिक दमन के साथ-साथ सामाजिक एवं आर्थिक नियंत्रण का भी रहा है। क्या पहनें, क्या सुनें, क्या पढ़ें, किससे प्रेम करें, किससे विवाह करें, इन सब पर निगरानी। इसकी प्रतिक्रिया में यह समाज आज पश्चिम एशिया में कुछ सेक्युलर दिखता है। जनता के एक वर्ग में अमेरिका विरोधी भावनाएं भी कम हैं। इसके बावजूद असंतोष और लोकतांत्रिक संक्रमण के बीच गहरी खाई कायम है, जिसे केवल बाहरी बमबारी से नहीं पाटा जा सकता।
ईरान ने बहरीन, कतर, कुवैत और यूएई में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमले कर अपनी प्रतिशोधी क्षमता का संकेत दिया है और होर्मुज स्ट्रेट में तेल की आवाजाही पर ग्रहण लगा दिया है। अरब देशों के शासक ईरानी प्रभाव से कभी खुश नहीं रहे, क्योंकि उन्हें आशंका सताती रही है कि अराजक ईरान पूरी पश्चिम एशियाई व्यवस्था को अस्थिर कर देगा। तेल बाजारों में हलचल, वैश्विक महंगाई पर दबाव और अफगानिस्तान–इराक–सीरिया के बाद एक और लंबे युद्ध से आजिज आ चुके अमेरिकी समाज जैसे पहलू इन हालात को और नाजुक बना देते हैं। विकल्पों की बात करें तो स्थिति बहुत आश्वस्तकारी नहीं है।
रजा पहलवी जैसी निर्वासन में रह रहे व्यक्तित्व प्रतीकात्मक आकर्षण तो रखते हैं और स्वतंत्र चुनाव में वे बेहतर प्रदर्शन भी कर पाएं, लेकिन उनके पास न जमीनी संगठन है और न कोई कारगर गठबंधन। इसलिए बेहतर यही होगा कि ईरान में आक्रामक सत्ता परिवर्तन अभियान के बजाय वहां लोक–शक्ति, दीर्घकालिक संस्थागत सुधार और क्षेत्रीय कूटनीति के बीच संतुलन के सोच को मजबूत किया जाए। ईरान में सत्ता परिवर्तन का वास्तविक पड़ाव अवश्य आएगा, पर बात तभी बनेगी जब यह चरणबद्ध एवं आंतरिक उत्प्रेरणा से उपजे। एकाएक बाहरी दबाव अराजकता को ही बढ़ाएगा।
(लेखक जेएनयू में एसोसिएट प्रोफेसर और ‘द इंडियन फ्यूचर्स’ के संस्थापक हैं)












