डॉ. ब्रजेश कुमार तिवारी। भारत की न्याय व्यवस्था आज केवल लंबित मुकदमों की समस्या तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह न्याय-क्षमता और शासन-क्षमता के बीच बढ़ते असंतुलन की एक बड़ी कहानी बन गई है। दिसंबर 2025 तक के आंकड़े दर्शाते हैं कि पिछले पांच वर्षों में जिला एवं अधीनस्थ अदालतों में लंबित मामलों की संख्या लगभग 4.11 करोड़ से बढ़कर 4.80 करोड़ हो गई है।

इसी अवधि में उच्च न्यायालयों में लंबित मामले 53.1 लाख से बढ़कर 63.3 लाख और सर्वोच्च न्यायालय में यह संख्या 70 हजार से बढ़कर लगभग 90.7 हजार तक पहुंच गई है। वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय में औसतन प्रति वर्ष 193 कार्य दिवस हैं, जबकि उच्च न्यायालयों में 215 और ट्रायल कोर्ट (अधीनस्थ न्यायालयों) में 245 दिन काम होता है। भारत उन देशों में शुमार है जहां की न्यायपालिका साल में सर्वाधिक दिन कार्य करती है।

अमेरिका में यह अवधि मात्र 79 दिन है, जबकि आस्ट्रेलिया, कनाडा, सिंगापुर और ब्रिटेन की शीर्ष अदालतें क्रमशः 97, 120, 145 और 189 दिन ही बैठती हैं। भारत का सर्वोच्च न्यायालय प्रतिदिन औसतन 10 से 15 फैसले सुनाता है, जबकि इसके विपरीत अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट पूरे एक वर्ष में अधिकतम 10 से 15 निर्णय ही देता है।

आम जनता में अक्सर न्यायालयों की छुट्टियों को लेकर बहस छिड़ी रहती है, परंतु सच तो यह है कि जो लोग इस व्यवस्था की आंतरिक कार्यप्रणाली से अनभिज्ञ हैं, वही इसकी आलोचना करते हैं। वास्तव में इन्हीं छुट्टियों के दौरान न्यायाधीश अपने आरक्षित निर्णयों और लंबित आदेशों को पूर्ण करते हैं। अवकाश के समय भी न्यायाधीश अपने चैंबर या घर पर स्थित कार्यालयों में बैठकर निरंतर जजमेंट लिखवाते हैं।

किसी भी निर्णय को अंतिम रूप देने से पहले उन्हें केस की विस्तृत फाइलों, लंबी जिरह के विवरणों और मामले से संबंधित पुराने कानूनी दृष्टांतों का गहन अध्ययन करना होता है। यह देश के सबसे कठिन कार्यों में से एक है, क्योंकि न्यायाधीश द्वारा लिखा गया प्रत्येक शब्द सीधे तौर पर लोगों के जीवन और उनके भविष्य को प्रभावित करता है। अत्यंत मानसिक दबाव और तनाव के प्रबंधन के लिए न्यायाधीशों को उचित विश्राम की आवश्यकता होती है।

यह धारणा भी गलत है कि न्यायाधीश केवल प्रातः 10 से सायं 4 बजे तक ही कार्य करते हैं। वे अपना अधिकांश समय शाम, रात और सप्ताहांत में फाइलें पढ़ने, आदेश तैयार करने और कानूनी शोध करने में व्यतीत करते हैं, क्योंकि अदालत की कार्यवाही के दौरान उनके पास इन कार्यों के लिए बहुत कम समय बचता है।

रिक्तियां तो एक बड़ी समस्या हैं ही, परंतु मुद्दा केवल पदों के खाली होने तक सीमित नहीं है। वास्तव में जब शासन-प्रशासन की नाकामियां रोजमर्रा के स्तर पर निर्णय लेने में अक्षम साबित होती हैं, तब नागरिक के पास न्याय और शिकायत के लिए एकमात्र भरोसेमंद विकल्प अदालत ही बचता है। यही देश में मुकदमों की बाढ़ की असली जड़ है। जब सरकारी फाइलें अटकती हैं, आदेश समय पर पारित नहीं होते और नियमों की व्याख्या हर दफ्तर में अलग-अलग की जाती है तो जवाबदेही से बचने की प्रवृत्ति बढ़ती है।

इसका परिणाम यह है कि आज सड़क, पानी, भर्ती, जमीन और स्कूल-फीस जैसे बुनियादी मुद्दे भी अदालत की चौखट तक पहुंच रहे हैं। इसके अतिरिक्त सरकारी विभाग स्वयं भी बड़े पैमाने पर अपील, रिविजन और रिट याचिकाओं में जाते हैं। ऐसे में न्यायालयों का बहुमूल्य समय न केवल विवाद निपटाने में, शासन के नियमों की निगरानी करने में भी व्यय होता है। अंततः अदालतें प्रशासनिक तंत्र की कमियों का बैकअप सिस्टम बनकर रह गई हैं, जिससे लंबित मामले बढ़ते हैं और सामान्य नागरिक के लिए न्याय की प्रक्रिया महंगी हो जाती है।

प्रतिदिन आने वाले नए मामलों की बाढ़ अदालतों का सुनवाई-समय निगल जाती है। ऐसे में वर्षों पुराने मुकदमे अगली तारीखों पर धकेल दिए जाते हैं। ऊपर से गवाहों की अनुपस्थिति, समन-तामीली में देरी, पुलिस चार्जशीट में विलंब और दस्तावेजी रिकॉर्ड की सुस्त प्रक्रिया एक केस को वर्षों तक खींचती है।

प्रश्न यह है कि क्या हम न्यायपालिका का बोझ केवल अदालतों के भीतर कम करेंगे या अदालतों के बाहर भी ठोस कदम उठाएंगे? असली राहत अदालत के बाहर मिलनी चाहिए, जहां नागरिक को समयबद्ध, तर्कसंगत और अपील-योग्य प्रशासनिक निर्णय प्राप्त हो सकें। केवल जटिल और गंभीर विवाद ही अदालत की दहलीज तक पहुंचने चाहिए। भारत में न्यायाधीश-जनसंख्या अनुपात के भारी अंतर को भी पाटना अनिवार्य है।

वर्ष 2020 के आंकड़ों के अनुसार भारत में प्रति 10 लाख की आबादी पर मात्र 21 न्यायाधीश थे, जबकि 1987 में ही विधि आयोग ने प्रति 10 लाख नागरिकों पर कम से कम 50 न्यायाधीश होने का सुझाव दिया था। अमेरिका में प्रति 10 लाख लोगों पर 107 न्यायाधीश हैं और ब्रिटेन में यह संख्या 51 है। सरकारों को अपनी मुकदमेबाजी नीति में आमूल-चूल बदलाव करना चाहिए। वर्तमान स्थिति न केवल न्यायालयों का बहुमूल्य समय नष्ट कर रही है, बल्कि निरर्थक मुकदमों पर सार्वजनिक धन की भी भारी बर्बादी हो रही है। प्रशासनिक जवाबदेही तय करना और न्यायिक नियुक्तियों में तेजी लाना ही इस संकट का एकमात्र स्थायी समाधान है।

(लेखक जेएनयू के अटल स्कूल ऑफ मैनेजमेंट में प्रोफेसर हैं)