ईरान के खिलाफ इजरायल-अमेरिका की संयुक्त सैन्य कार्रवाई फिलहाल किसी नतीजे पर पहुंचती नहीं दिख रही है। न तो इजरायल-अमेरिका के हमले थम रहे हैं और न ही ईरान की जवाबी कार्रवाई। भले ही ट्रंप यह कह रहे हों कि ईरान वार्ता के लिए राजी हो गया है, पर ईरानी नेता इससे साफ इन्कार कर रहे हैं। कहना कठिन है कि यह सैन्य टकराव कब और कैसे खत्म होगा, क्योंकि इसके आसार नहीं कि ईरान के सर्वोच्च नेता खामेनेई की मौत से वहां सत्ता परिवर्तन सुनिश्चित हो गया है।

ईरान फिलहाल भले ही नेतृत्व विहीन सा दिख रहा हो, लेकिन उसकी सेना और विशेष रूप से इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कोर अपने कदम पीछे खींचने के लिए तैयार नहीं। वह इजरायल और अमेरिका के ठिकानों को निशाना बनाने के साथ खाड़ी के देशों के नागरिक क्षेत्रों में भी ड्रोन और मिसाइलें दाग रही है। इससे इन देशों में अफरा-तफरी का माहौल है। पता नहीं ईरान पड़ोसी देशों के नागरिक ठिकानों को किस मकसद से निशाना बना रहा है, क्योंकि इससे वह अपने विरोधी तो बढ़ा ही रहा है, पहले से अधिक अलग-थलग भी पड़ता जा रहा है।

ईरान जिस तरह ऊर्जा आपूर्ति के मार्गों और विशेष रूप से होर्मुज जल मार्ग के लिए खतरे पैदा कर रहा है, उससे तेल और गैस की आपूर्ति पर असर पड़ना शुरू हो गया है। यह समुद्री जल मार्ग लगभग 25 प्रतिशत तेल और 30 प्रतिशत एलएनजी आपूर्ति का रास्ता है, जो इसे वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बनाता है। इस जल मार्ग के बाधित होने का मतलब है तेल और गैस के दाम बढ़ना और एशिया, यूरोप समेत दुनिया के अन्य हिस्सों की अर्थव्यवस्था प्रभावित होना। यह ध्यान रहे कि तेल के दाम बढ़ने शुरू हो गए हैं।

यदि वे इसी तरह बढ़ते रहे तो पहले से ही अनिश्चितता से गुजर रही विश्व अर्थव्यवस्था का संकट और बढ़ जाएगा। इसके लिए अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ही जिम्मेदार होंगे, क्योंकि यह एक तथ्य है कि इजरायल अमेरिका की सहमति और सहायता के बिना ईरान पर हमला बोलने की स्थिति में नहीं था। इस विनाशकारी सैन्य टकराव का केंद्र बिंदु भले ही पश्चिम एशिया हो, लेकिन उससे पूरा विश्व प्रभावित हो रहा है। कठिनाई यह है कि कोई भी बीच-बचाव करने की स्थिति में नहीं।

यह सैन्य संघर्ष जितनी जल्दी थमे, उतना ही पश्चिम एशिया समेत विश्व के लिए अच्छा, लेकिन इसकी सूरत तब बनेगी, जब दोनों पक्ष यह समझेंगे कि वे अपनी ही नहीं चला सकते। ईरान भले ही इजरायल-अमेरिका को सबक सिखाने का दम भर रहा हो, लेकिन वह इन दोनों देशों की सैन्य शक्ति का लंबे समय तक सामना करने की स्थिति में नहीं। इसी तरह अमेरिका और इजरायल के लिए यह आसान नहीं कि वे ईरान में आनन-फानन सत्ता परिवर्तन कर सकें।