अर्शिया मलिक। वर्ष 1979 में अयातुल्ला रुहेल्ला खुमैनी के नेतृत्व में ईरान एक राजशाही से मजहबी गणराज्य में परिवर्तित हुआ, लेकिन उनके उत्तराधिकारी अयातुल्ला अली खामेनेई के शासनकाल में स्थिति और बिगड़ गई। इन 46 वर्षों में ईरानी समाज का सफर कट्टरपंथी इस्लामवाद, परोक्ष युद्ध, जनता की कीमत पर अत्यधिक सैन्य खर्च, पश्चिम एवं यहूदी विरोधी विचारधाराओं और गहरी जड़ें जमा चुकी स्त्री-द्वेषी संस्कृति से भरा रहा। इसने आधी आबादी का दम घोंटा और ईरान को वैश्विक स्तर पर अलग-थलग किया। उसके सामाजिक ताने-बाने को भी खोखला किया। इस पतन की नींव 1979 की ईरानी क्रांति में पड़ी, जिसने शाह मोहम्मद रजा पहलवी को सत्ता से हटाकर खुमैनी को सर्वोच्च नेता बनाया।

खुमैनी ने एक ऐसी व्यवस्था स्थापित की, जहां मजहबी सत्ता ने लोकतांत्रिक इच्छा को पीछे छोड़ दिया और मजहबी तंत्र को लोकलुभावन बयानबाजी के साथ मिला दिया। यह महज राजनीतिक बदलाव नहीं, एक सामाजिक उथल-पुथल थी, जिसने ईरानी जीवन के हर पहलू में कट्टरता का संचार कर दिया। 1989 में सलमान रुश्दी के खिलाफ खुमैनी का फतवा इसी कट्टरता का उदाहरण था, जिसने साहित्यिक आलोचना को हत्या के वैश्विक आह्वान में बदल दिया और ईरान को वैचारिक आतंक के निर्यातक के रूप में स्थापित कर दिया।

ईरान ने परोक्ष आतंकवाद को विदेश नीति के एक अंग के रूप में अपनाया। 1980 के दशक में ईरान ने इजरायली और पश्चिम का मुकाबला करने के लिए लेबनान में हिजबुल्ला की स्थापना कर उसे पैसा, हथियार और प्रशिक्षण दिया। यह कथित क्रांति के निर्यात की एक सोची-समझी रणनीति थी। खुमैनी ने कहा था कि इस्लाम का प्रसार तब तक आवश्यक है, जब तक कि ‘अल्लाह के सिवा कोई ईश्वर नहीं है’ का नारा विश्व भर में गूंज न उठे।

1989 में जब खामेनेई ने सत्ता संभाली तो उग्रवाद और तीव्र हो गया। उनके शासनकाल में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आइआरजीसी) ने कुद्स फोर्स का विस्तार किया। एक समय ईरान इराक में शिया मिलीशिया, गाजा में हमास और सीरिया में असद शासन का समर्थन करने के साथ ही भारी खर्च कर रहा था। अक्टूबर 2024 में ईरान द्वारा इजरायल पर किए गए मिसाइल हमले तेहरान में हमास नेता इस्माइल हानिये की हत्या के प्रतिशोध में किए गए। इससे परोक्ष आतंकवाद प्रत्यक्ष टकराव में बदल गया। दिसंबर 2024 में असद के पतन से ईरान को झटका लगा, फिर भी खामेनेई शासन ने अपना रुख नहीं बदला। उनकी रणनीति ने युद्धों को लंबा खींचा, लाखों को विस्थापित किया और ईरान को अछूत देश बना दिया।

हथियारों पर केंद्रित रहना ईरान के लिए विनाशकारी साबित हुआ। क्रांति के बाद ईरान की तेल पर निर्भर अर्थव्यवस्था को सैन्य शक्ति की ओर मोड़ दिया गया। खामेनेई के शासनकाल में सैन्य खर्च में भारी वृद्धि हुई। 2005 में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के प्रस्तावों का उल्लंघन करते हुए यूरेनियम संवर्धन शुरू किया गया। इस कारण अमेरिका के साथ वार्ता रुक गई। कड़े आर्थिक प्रतिबंधों ने ईरान की अर्थव्यवस्था को पंगु बना दिया। मुद्रास्फीति, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के कारण हालात खराब हुए। इससे गरीबी बढ़ी और लाखों कुशल कामगारों का बड़े पैमाने पर पलायन हुआ।

पश्चिम और यहूदी विरोध ही ईरानी की मजहबी सत्ता को टिकाए रखने वाली वैचारिक धुरी बनी रही। खुमैनी ने अमेरिका को ‘बड़ा शैतान’ करार देते हुए 1979-1981 के बंधक संकट के बाद उससे संबंध ही तोड़ लिए। खामेनेई ने खुमैनी के उन्मादी रवैये को और आगे बढ़ाया। ईरान इजरायल का नाम लेने के बजाय उसे ‘जायोनी सत्ता’ बताता है। वह फलस्तीन के लिए लड़ रहे हमास जैसे समूहों को समर्थन देते हुए गाजा के 90 प्रतिशत बजट का प्रबंध भी करता है। ईरान में ठीक-ठाक संख्या वाले यहूदियों की आबादी लगातार सिमट रही है। जो बचे हैं, वे भी प्रतिबंधों के शिकार हैं।

कहने को तो इस्लामी मानकों के अनुरूप बना संविधान महिलाओं को बराबरी के दर्जे की बात करता है, लेकिन वास्तविकता इसके उलट है। आधी आबादी का संस्थागत दमन होता है। महिलाओं की गवाही का प्रभाव पुरुषों की तुलना में आधा माना जाता है। महिलाओं के जीवन का मोल भी आधा है। हिजाब के लिए कड़ी बंदिशें हैं। खुमैनी ने फतवा जारी करके लड़कियों के लिए विवाह की न्यूनतम आयु को घटाकर नौ वर्ष कर दिया था।

खामेनेई के दौर में हिजाब की अनिवार्यता को लेकर बड़ी सख्ती कई गई। इसके अनुपालन के लिए तेहरान में 70,000 पुलिसकर्मियों की तैनाती हुई। इसका नतीजा तमाम गिरफ्तारियों के रूप में सामने आया। महिलाओं के स्टेडियम में प्रवेश से लेकर ग्लैमरस हेयरस्टाल और कुत्ते पालने तक पर प्रतिबंध है। 2022 में कथित अनुचित हिजाब के आरोप में हिरासत के दौरान महसा अमीनी की मौत के बाद देशव्यापी विरोध-प्रदर्शन हुए। उनमें 500 से अधिक लोग मारे गए और हजारों गिरफ्तार हुए। पक्षपाती कानूनों की वजह से दुष्कर्मों के मामले में दोष सिद्धि असंभव सी है। यह सही है कि महिला साक्षरता बढ़कर 80 प्रतिशत तक हो गई और उनका संसद में प्रतिनिधित्व बढ़ा है, पर ये उपलब्धियां उस असमानता की खाई को नहीं ढक सकतीं, जिनसे महिलाओं को जूझना पड़ रहा है।

ईरान की 1979 से अब तक की यात्रा पर दृष्टि डालें तो ईरानी समाज क्रांति के उत्साह को पीछे छोड़ते हुए दमन और अलगाव की ओर ही बढ़ा है। पश्चिम-विरोधी और यहूदी-विरोधी नीतियों से जहां सहयोगी छिटकते गए, वहीं स्त्री-विरोध ने महिलाओं की आवाज को दबाकर समाज की मूल संरचना को ही आहत किया। ईरान आज जिस स्थिति में है, उससे कहीं बेहतर का हकदार है। एक ऐसी स्थिति का, जहां समाज मजहबी जकड़नों से मुक्त हो, उग्रता की जगह समानुभूति का भाव हो और महिलाओं, अल्पसंख्यकों और असहमति रखने वाले लोगों को भी फलने-फूलने का अवसर मिले। सच्ची क्रांति के भाव भीतर से ही उपजेंगे और वही भाव उन मानवीय मूल्यों की भरपाई करेंगे, जो बीते दशकों में तिरोहित होते गए।

(लेखिका शिक्षाविद् एवं इस्लामी सामाजिक-राजनीतिक मामलों की विश्लेषक हैं)