राजीव सचान। कट्टरता और विशेष रूप से मजहबी कट्टरता और कुरीतियों के खिलाफ लड़ना कभी भी आसान नहीं रहा। कट्टरता के खिलाफ लड़ाई लड़ने वालों को कई बार जान से भी हाथ धोना पड़ा है। दिल्ली से सटे गाजियाबाद में रहने वाले सलीम अहमद इन दिनों जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं, क्योंकि पिछले दिनों उन पर प्राणघातक हमला हुआ। यह हमला इसलिए हुआ, क्योंकि सलीम मजहबी कट्टरता के खिलाफ खुलकर बोलते हैं और इस्लाम की उन मान्यताओं की आलोचना करते हैं, जो उनकी समझ से न तो आज के युग के अनुकूल हैं, न सभ्य समाज के लिए स्वीकार्य हैं और न ही सह-अस्तित्व में सहायक हैं।

इस्लाम का परित्याग करने के कारण सलीम अपने को एक्स मुस्लिम कहते हैं। वे नास्तिक सम्मेलनों का आयोजन करते रहे हैं और खुद को नास्तिक की तर्ज पर वास्तिक कहते हैं। वे अपना यूट्यूब चैनल चलाते हैं, जिसमें मजहबी कट्टरता और कुरीतियों से मुक्ति के उपायों पर चर्चा करते हैं। वे ऐसे एकलौते शख्स नहीं। दुनिया में खुद को एक्स मुस्लिम कहने वालों की कमी नहीं।

इस्लामी देशों में भी एक्स मुस्लिम तेजी से बढ़ रहे हैं। यूरोप और अमेरिका में तो उनके संगठन बने हुए हैं और वे अपनी गतिविधियों को एक्स मुस्लिम मूवमेंट की संज्ञा देते हैं। यह आंदोलन भारत में भी दस्तक दे चुका है और केरल के एक्स मुस्लिमों यानी इस्लाम छोड़ चुके लोगों ने अपना संगठन बना रखा है। यह यही बताता है कि भारत में एक्स मुस्लिम मूवमेंट जोर पकड़ रहा है। भारत के साथ-साथ पाकिस्तान और बांग्लादेश के भी कई एक्स मुस्लिम विदेश में सक्रिय हैं। इस्लामी देशों में सबसे अधिक एक्स मुस्लिम संभवतः ईरान में हैं। इसका कारण वहां हद से ज्यादा इस्लामी कट्टरता होना है।

किसी भी समाज में जब मजहबी-पंथिक कट्टरता हद से अधिक बढ़ जाती है तो उससे आजिज आए लोग उसके खिलाफ आवाज उठाने लगते हैं। ऐसे कई लोग या तो नास्तिक बन जाते हैं या फिर एग्नास्टिक (अज्ञेयवादी) यानी ऐसे, जो इसे लेकर सुनिश्चित नहीं होते कि ईश्वर, अल्ला, गाड आदि है या नहीं? एक समय भारत में इक्का-दुक्का घोषित एक्स मुस्लिम थे, लेकिन आज उनकी गिनती करना कठिन है। इनमें से कई अपने यूट्यूब चैनल चलाते हैं और कभी-कभार सार्वजनिक कार्यक्रमों में भी भागीदारी करते हैं।

पहले वे अपनी पहचान और चेहरा छिपाकर रखते थे, लेकिन आज कई ऐसे हैं, जो इसकी आवश्यकता नहीं समझते। सलीम वास्तिक भी ऐसे लोगों में हैं। निःसंदेह अपनी पहचान उजागर कर मजहबी कट्टरता के खिलाफ बोलने वाले एक्स मुस्लिम कम ही हैं, क्योंकि उनकी सुरक्षा के लिए खतरा बना रहता है। उन्हें जान से मारने और सीधे तौर पर कहें तो सिर तन से जुदा करने की धमकियां मिलती रहती हैं। सलीम वास्तिक को भी ऐसी ही धमकियां मिल रही थीं, लेकिन वे धमकियों से डरने वाले लोगों में से नहीं थे।

पहलगाम में मजहब पूछकर लोगों की हत्या के बाद सलीम अपने कुछ साथियों के साथ कश्मीर पहुंच गए थे। वहां वे मजहबी कट्टरता के खिलाफ अपनी बात तब तक बेबाकी से कहते रहे, जब तक कुछ कट्टरपंथियों की शिकायत पर पुलिस ने उन्हें शांति भंग के आरोप में गिरफ्तार नहीं कर लिया। पुलिस ने उनका और उनके साथियों के यूट्यूब चैनल डिलीट कर दिए, लेकिन वहां से लौटने के बाद वे नए यूट्यूब चैनल के साथ फिर से अपने मिशन में लग गए। उन्हें फिर से धमकियां मिलने लगीं और पिछले शुक्रवार जीशान और गुलफाम नाम के दो भाइयों ने उनके घर जाकर धारदार हथियारों से उनका गला रेतने की कोशिश की।


रमजान का महीना और शुक्रवार के दिन ही गला रेतने के कृत्य पर गौर करें। हमलावर पिस्टल से लैस थे, लेकिन उन्होंने सलीम का गला रेतना और उन्हें निशाना बनाने के लिए शुक्रवार का चयन करना आवश्यक समझा। इसलिए समझा, क्योंकि वे एक तो उन मजहबी मान्यताओं पर यकीन रखते थे कि इस्लाम छोड़ने वालों की सजा मौत है और दूसरे, वे पाकिस्तान में गूंजते रहने वाले इस खौफनाक नारे के असर में रहे-गुस्ताखे रसूल की एक ही सजा-सिर तन से जुदा। अब यह नारा भारत में जब-तब न केवल सुनाई देता है, बल्कि कुछ लोगों की ईशनिंदा यानी कथित गुस्ताखी में गला रेत कर हत्या भी की जा चुकी है, जैसे कमलेश तिवारी, कन्हैया लाल और उमेश कोल्हे।

सलीम वास्तिक को निशाना बनाने वालों ने यह सोचा होगा कि उनकी यह खौफनाक हरकत देश के एक्स मुस्लिमों में भय पैदा करेगी और वे उनकी आवाज दबा देंगे, लेकिन अब होगा यह कि लोग और खासकर युवा मुस्लिम भी यह जानने के लिए उत्सुक होंगे कि आखिर सलीम वास्तिक क्या कहते थे और लोग एक्स मुस्लिम क्यों बन रहे हैं?

यह उत्सुकता सलीम वास्तिक के हमलावरों के इरादों पर पानी फेरने का ही काम करेगी, लेकिन केवल इतने से संतोष नहीं किया जा सकता कि उनका एक हमलावर पुलिस मुठभेड़ में मारा गया। सरकारों के लिए यह आवश्यक है कि वे मजहबी कट्टरता से लड़ने वालों और खासकर एक्स मुस्लिमों की सुरक्षा के खास उपाय करें, क्योंकि सबसे अधिक खतरा उन्हें ही है, न कि अन्य मजहब के आलोचकों को। जिस देश में चार्वाक जैसे नास्तिक संत कहे गए हों, वहां एक्स मुस्लिमों की कट्टरता से लड़ाई कठिन नहीं होनी चाहिए।

(लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडिटर हैं)