विचार: आवेग को आनंद से भरने वाला पर्व
होली उसी प्रदेश की यात्रा है-क्षण भर की, पर पूर्ण, चंचल, पर गहन, रंगीन पर विचारमय। जब अगला वर्ष आता है, जब फिर फाल्गुन की हवा बहती है, तब वही स्मृति फिर जागती है।
HighLights
होली सामाजिक बंधनों को शिथिल कर मनुष्य को मुक्त करती है।
यह पर्व तनावों को आनंद में बदलने की कला सिखाता है।
रंगों की विविधता एकता और सह-अस्तित्व का प्रतीक है।
परिचय दास। रंग जब हवा में घुलता है तो वह केवल दृश्य नहीं रचता, वह जीवन की कठोर रेखाओं पर एक मृदुल कंपन अंकित करता है। होली उसी कंपन का उत्सव है। एक ऐसा पड़ाव जब समाज की सुव्यवस्थित संरचनाएं अपनी दृढ़ता को थोड़ी देर के लिए शिथिल कर देती हैं और मनुष्य अपने मूल, निष्कवच रूप में सामने आता है। यह उत्सव बताता है कि अनुशासन जरूरी है, पर उससे भी अधिक आवश्यक है उसका समय-समय पर विसर्जन।
वर्ष भर मनुष्य अनेक भूमिकाएं निभाता है, जिनमें पद, प्रतिष्ठा, उत्तरदायित्व, मर्यादा के तंतु बंधे होते हैं। ये सब उसके व्यक्तित्व को आकार देते हैं, परंतु कहीं-न-कहीं उसे आवेष्टित भी करते हैं। होली उन आवरणों पर रंग का स्पर्श रखती है। रंग चेहरा ढक लेता है, किंतु पहचान को छीनता नहीं, केवल उसे कुछ समय के लिए पार्श्व में धकेल देता है। उस क्षण व्यक्ति अपने परिचय से अधिक अपनी उपस्थिति में होता है। वह अधिकारी नहीं, केवल मनुष्य होता है। वह विभाजन नहीं, केवल स्पंदन होता है। इस उत्सव का सौंदर्य उसकी क्षणभंगुरता में है।
रंग कुछ ही घंटों में धुल जाते हैं, लेकिन उनसे जो अनुभव भीतर उतरता है, वह दीर्घजीवी होता है। यह अस्थायी उन्मुक्तता एक गहरी स्मृति छोड़ जाती है कि विभाजन शाश्वत नहीं और न दूरी अनिवार्य। समाज की कठोर रेखाएं, जिन्हें हम नियति समझ बैठते हैं, वे भी रंग की एक बौछार से धुंधली हो सकती हैं। यह धुंधलापन विनाश नहीं, संभावना है। होली का दार्शनिक अर्थ इसी संभावना में निहित है। किसी समाज को अपने भीतर संचित तनावों को सौंदर्य में रूपांतरित करने की कला सीखनी होती है। यदि असंतोष केवल दमन में रहे तो वह कठोरता बन जाता है, यदि वह हिंसा में फूट पड़े तो विनाश, मगर यदि वही ऊर्जा गीत, परिहास और रंग में घुल जाए तो वह उत्सव बन जाती है। होली इसी रूपांतरण का अभ्यास है-आवेग को आनंद में बदल देने की सांस्कृतिक चातुरी।
रंगों का बहुलत्व अर्थपूर्ण है। कोई एक रंग पर्याप्त नहीं। लाल की ऊष्मा, पीले की दीप्ति, हरे की ताजगी, नीले की गहराई, ये सब साथ मिलकर एक ऐसा दृश्य रचते हैं, जहां भिन्नता विरोध नहीं, विन्यास बन जाती है। प्रत्येक रंग दूसरे से स्पर्धा नहीं करता। वह उसमें घुलकर अपनी आभा का विस्तार करता है। यह दृश्य मानो कहता है कि विविधता जब संगति में होती है, तब वह विभाजन नहीं, सौंदर्य रचती है। इसी क्रम में अग्नि और रंग का क्रम अत्यंत अर्थवान है। उत्सव की पूर्वरात्रि में दहन होता है-अहंकार का, अतिरेक का, दंभ का। अग्नि स्मरण कराती है कि जो कठोर है, जो जड़ है, उसे कभी-न-कभी राख होना पड़ता है और उसी राख की पृष्ठभूमि पर अगली सुबह रंगों की कोमल वर्षा आरंभ होती है। यह क्रम बताता है कि शुद्धि और सृजन एक-दूसरे के विरोधी नहीं, अपितु वे एक ही चक्र के दो छोर हैं। दहन के बिना उल्लास अधूरा है और उल्लास के बिना दहन निष्फल।
होली का हास्य विशिष्ट है। यहां हंसी उपहास नहीं, आत्म-उपहास है। लोग स्वयं को रंग से भरते हैं, स्वयं को विचित्र रूप में देखते हैं, खिलखिलाते हैं। यह आत्म-परिहास मनुष्य को हल्का करता है। गंभीरता की दीवारें पिघलती हैं और भीतर छिपा बालक बाहर आता है। यह बालकत्व अपरिपक्वता नहीं, बल्कि उस सहजता का पुनरागमन है, जिसे जीवन की दौड़ में हमने पीछे छोड़ दिया था। स्पर्श का सौंदर्य भी इस उत्सव में अद्वितीय है। रंग लगाना केवल रंग लगाना नहीं, स्वीकार का संकेत है। यह कहना है कि मैं तुम्हें अपने निकट आने देता हूं। समाज ने जो दूरियां सावधानी से निर्मित की हैं, वे इस दिन पारगम्य हो जाती हैं। यह पारगमन स्थायी नहीं, फिर भी स्मरण कराता है कि दूरी स्वभाव नहीं, व्यवस्था है और व्यवस्था बदल सकती है, यदि मनुष्य चाहे।
ऋतु का परिवर्तन इस उत्सव को और भी गहन बना देता है। शीत की कठोरता के बाद वसंत की कोमल हवा बहती है। वृक्षों पर नई कोंपलें फूटती हैं, खेतों में हरियाली लहराती है, आकाश अधिक उज्ज्वल लगता है। प्रकृति स्वयं रंगों में खिल उठती है। मनुष्य उसी का सहभागी बनता है। वह प्रकृति के राग में अपना स्वर जोड़ देता है। होली इस प्रकार केवल सामाजिक उत्सव नहीं, ऋतु का भी उत्सव है। बाहरी परिवर्तन के आंतरिक अनुवाद का माध्यम। इस उत्सव की लय में एक गहरी सामूहिकता है। ढोल की थाप पर कदम मिलते हैं, गीत की धुन पर स्वर एक होते हैं। व्यक्ति की अलग आवाज सामूहिक गान में विलीन हो जाती है। यह विलय व्यक्ति का लोप नहीं, उसका विस्तार है। जब वह अकेला गाता है तो उसका स्वर सीमित होता है। जब सब साथ गाते हैं तो वही स्वर अनंत में गूंज उठता है। होली उस अनंत गूंज का क्षण है।
जब दिन ढलता है, जब रंग से भीगे चेहरे थककर शांत हो जाते हैं, तब एक मृदुल शांति उतरती है। गलियां धीरे-धीरे स्वच्छ होती हैं, वस्त्र धोए जाते हैं, पर मन में हल्की आभा बनी रहती है। जैसे किसी ने भीतर की कठोरता पर पानी छिड़क दिया हो। यह आभा बताती है कि जीवन केवल नियम नहीं, केवल श्रम नहीं, केवल संघर्ष नहीं, वह उल्लास भी है, परिहास भी है, रंग भी है।
होली इसलिए केवल एक पर्व नहीं, स्मरण भी है। स्मरण कि मनुष्य की मूल प्रकृति विभाजन से अधिक मिलन में है, कठोरता से अधिक कोमलता में है, एकरूपता से अधिक बहुलता में है। वह बताती है कि यदि जीवन को केवल अनुशासन में बांधा जाए तो वह सूख जाएगा, उसमें रंग का स्पर्श आवश्यक है। रंग का यह स्पर्श क्षणिक है, पर उसका अर्थ दीर्घ है। वह हमें सिखाता नहीं, संकेत देता है कि भीतर कहीं एक ऐसा प्रदेश है, जहां हम सभी एक-दूसरे के निकट हैं, जहां भेद का आवरण हल्का है, जहां हंसी सहज है।
होली उसी प्रदेश की यात्रा है-क्षण भर की, पर पूर्ण, चंचल, पर गहन, रंगीन पर विचारमय। जब अगला वर्ष आता है, जब फिर फाल्गुन की हवा बहती है, तब वही स्मृति फिर जागती है। रंग फिर उड़ते हैं, हंसी फिर गूंजती है और जीवन फिर अपने कठोर रूप पर कोमलता की एक परत चढ़ा लेता है। यही उसका लालित्य है-क्षण में अनंत का आभास और रंग की धूल में मनुष्यत्व का उजास।
(लेखक नव नालंदा महाविहार विश्वविद्यालय, नालंदा में प्रोफेसर हैं)












