डॉ. शिवानी कटारा। भारत उत्सवों की भूमि है, तीज-त्योहारों की पावन धरा है। किसी समाज में पर्वों की निरंतरता उसकी सांस्कृतिक समृद्धि और सामूहिक उल्लास का संकेत मानी जाती है। होली केवल एक पर्व नहीं, बल्कि भारत की धड़कनों में गूंजता समरसता का संगीत है। फाल्गुन पूर्णिमा को होलिका दहन और फिर धुलेंडी पर रंगोत्सव रंगों का एक ऐसा संवाद है, जिसमें अतीत की राख से भविष्य के रंग जन्म लेते हैं। होली का दार्शनिक आधार भारतीय चेतना की गहराइयों में निहित है। प्रह्लाद की अटूट श्रद्धा और होलिका के दहन की कथा केवल पौराणिक आख्यान नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर चलने वाले सत्य और असत्य के संघर्ष का रूपक है।

जब हिरण्यकशिपु का अहंकार अग्नि में भस्म होता है, तब यह केवल एक पात्र का अंत नहीं, बल्कि अन्याय, दंभ और विभाजनकारी मानसिकता का अंत है। जब तक हमारे भीतर की असमानता नहीं जलेगी, तब तक बाहर की समरसता अधूरी रहेगी और फिर रंगोत्सव के दिन जब रंग चेहरे पर लगते हैं, तब असर मन पर होता है। उस क्षण न कोई ऊंच-नीच का प्रश्न रह जाता है, न अमीर-गरीब का अंतर। रंग सबको एक-सा बना देते हैं-एक ही हंसी, एक ही उमंग, एक ही स्पर्श। यह बताता है कि विविधता विरोध नहीं, सौंदर्य है। जैसे अनेक रंग मिलकर इंद्रधनुष रचते हैं, वैसे ही विभिन्न समुदाय मिलकर राष्ट्र के आत्मा को पूर्ण बनाते हैं।

भारत के कोने-कोने में होली के रूप भिन्न हैं, पर भाव एक है। ब्रज मंडल में होली वसंत पंचमी से शुरू होकर रंगभरनी एकादशी के बाद चरम पर पहुंचती है। लड्डूमार से लट्ठमार तक अनोखे उत्सव मनते हैं और देश-विदेश से लोग ब्रज पहुंचते हैं। बरसाने की लट्ठमार होली में हंसी सचमुच हवा में घुली रहती है। गलियों में उड़ता गुलाल, छतों पर खिलखिलाहट और चौक की ठिठोली से पूरा ब्रज मुस्कुराता दिखता है। सजी महिलाएं लाठियां थामे बढ़ती हैं, पुरुष ढाल संभाले शरारती अंदाज में बचते हैं। यह सब प्रेम की मीठी नोक-झोंक का उत्सव है।

इस हंसी-ठिठोली के बीच परंपरा केवल निभाई नहीं जाती, बल्कि उल्लास के साथ जी जाती है। ऊपर से दृश्य चंचल दिखता है, पर भीतर गहरी सांस्कृतिक स्मृति धड़कती है। यह राधा-कृष्ण की आनंदमयी लीलाओं का स्मरण कराती है, जहां रूठना-मनाना भी प्रेम का ही एक रंग है। यहां स्त्री उत्सव की केंद्र-बिंदु बनकर उभरती है, उसकी सक्रियता शक्ति और स्नेह के सुंदर संतुलन का प्रतीक बनती है। एक ऐसा संतुलन, जिसमें हास्य भी है, सम्मान भी और अपनापन भी। वहीं वृंदावन की फूलों की होली में जब रंगों के स्थान पर पुष्प बरसते हैं तो वातावरण मानो सुगंधित भक्ति से भर उठता है। ब्रज की होली वस्तुतः अद्वैत का उत्सव है, जहां बाहरी रंग भीतर की चेतना को रंग देते हैं।

होली के पकवान भी जैसे समरसता का स्वाद हैं। गुजिया की मिठास, दही-बड़े की कोमलता, मालपुए की सुगंध और ठंडाई की शीतलता केवल व्यंजन नहीं, बल्कि साझा संस्कृति की थाली हैं। इस पर्व की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि यह सामाजिक दीवारों को नरम कर देता है और हमें याद दिलाता है कि यदि एक दिन के लिए हम भेद भूल सकते हैं तो सदा के लिए क्यों नहीं? रंग केवल बाहरी पदार्थ नहीं, बल्कि भावनाओं के प्रतीक हैं। लाल प्रेम का, पीला आशा का, हरा नवजीवन का, नीला विश्वास का। वे हमें सिखाते हैं कि जीवन श्वेत-श्याम नहीं, उसमें अनेक स्वर और छायाएं हैं। यदि हम केवल अपने ही रंग को सर्वोच्च मानेंगे तो संघर्ष जन्म लेगा, पर यदि हम सब रंगों को स्वीकार करेंगे तो एक अद्भुत चित्र बनेगा-समरसता का चित्र। आज जब समाज भिन्न विचारों और पहचानों से बंटता जा रहा है, तब होली का उत्सव हमें संदेश देता है-मतभेद छोड़ो, मनभेद छोड़ो, क्षमा करो, गले मिलो। यह पुनर्मिलन का संस्कार है।

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से होली आज की भागदौड़ और दबाव भरी जीवनशैली में एक सशक्त तनाव-नाशक उत्सव है। रंगों के साथ खुलकर हंसने, नाचने और गले मिलने से तनाव और अकेलेपन की भावना कम होती है। यह पर्व दबे हुए भावों को सहज वातावरण में व्यक्त करने का अवसर देता है। गिले-शिकवे भूलकर मेल-मिलाप करना मानसिक बोझ हल्का करता है और संबंधों में नई ऊष्मा भरता है। सामूहिक उल्लास व्यक्ति को ‘मैं’ से ‘हम’ की ओर ले जाता है। डिजिटल युग में, जहां संबंध स्क्रीन की रोशनी में सिमटते जा रहे हैं, होली वास्तविक स्पर्श का महत्व पुनः स्थापित करती है।

जेन-जी के लिए यह केवल इंस्टाग्राम की रील या रंगीन सेल्फी का अवसर नहीं, बल्कि वास्तविक संवाद का उत्सव है। यह पीढ़ी विविधता, समावेशिता और समानता की बात करती है। होली उन्हें इन मूल्यों को जीने का अवसर देती है। जब वे पर्यावरण अनुकूल रंग चुनते हैं, सामुदायिक कार्यक्रमों में भाग लेते हैं और विभिन्न पृष्ठभूमि के लोगों के साथ खुलकर मिलते हैं, तब वे समरसता को केवल शब्द नहीं, कर्म बना देते हैं। इस प्रकार होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि मानसिक ताजगी, भावनात्मक संतुलन और सामाजिक जुड़ाव का प्रभावी माध्यम है। यह मृदुता, सहजता और अपनत्व का वह त्रिवेणी पर्व है, जो मन के मैल को प्रेम की वर्षा में बहा देता है। ‘होली है...’ कहकर हम विविध रंगों में एक चेतना का उत्सव मनाते हैं और समरसता को जीते हैं।

(लेखिका लोक स्वास्थ्य एवं सामाजिक मामलों की अध्येता हैं)