संपादकीय: अनिश्चितता से घिरा ईरान, पूरी दुनिया पर पड़ेगा असर
इजरायल-अमेरिका की संयुक्त कार्रवाई में अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद ईरान में नेतृत्व परिवर्तन हुआ है, पर सत्ता परिवर्तन संदिग्ध है। ईरानी सेना बदला लेने की धमकी दे रही है, जिससे पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ रहा है, जिसका वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर असर पड़ेगा।
HighLights
खामेनेई की मौत के बाद ईरान में नेतृत्व परिवर्तन, सत्ता परिवर्तन नहीं।
ईरानी सेना द्वारा इजरायल-अमेरिका से बदला लेने की धमकी जारी।
पश्चिम एशिया में तनाव वृद्धि, वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर असर।
इजरायल-अमेरिका की संयुक्त सैन्य कार्रवाई में ईरान के सर्वोच्च शासक एवं मजहबी नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद वहां नेतृत्व परिवर्तन तो हो गया, लेकिन यह कहना कठिन है कि सत्ता परिवर्तन भी हो जाएगा, जो कि अमेरिकी राष्ट्रपति का लक्ष्य है। एक तो ईरान वेनेजुएला नहीं है और न ही वहां शासन एवं सेना को नियंत्रित करने वाले तंत्र में फिलहाल किसी असहमति और विद्रोह के आसार दिख रहे हैं।
इसका प्रमाण यह है कि खामेनेई के स्थान पर अंतरिम नेतृत्व के नाम की घोषणा कर दी गई है एवं ईरानी सेना और विशेष रूप से रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के कमांडर इजरायल-अमेरिका के हमले का जवाब देने के साथ ही खामेनेई की मौत का बदला लेने की धमकी भी दे रहे हैं। ईरानी सेना जिस तरह इजरायल को निशाना बनाने के साथ सऊदी अरब, कतर, जार्डन, ओमान, बहरीन, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात आदि जगह अमेरिकी सैन्य ठिकानों के साथ नागरिक क्षेत्रों को निशाना बना रही है, उससे यही स्पष्ट होता है कि वह आसानी से हार नहीं मानने वाली।
ईरानी सेना ने जिस तरह पड़ोसी देशों में नागरिक ठिकानों पर भी हमले किए, उससे पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ेगा। इसका असर भारत समेत पूरी दुनिया पर पड़ेगा, क्योंकि यह क्षेत्र विश्व को ऊर्जा की आपूर्ति का बड़ा स्रोत है। ईरानी सेना के प्रतिरोध के बावजूद तथ्य यही है कि वह इजरायल और अमेरिका की सैन्य क्षमता का लंबे समय तक सामना नहीं कर सकती।
इस पर आश्चर्य नहीं कि खामेनेई की मौत के बाद जहां आम तौर पर शिया जगत में आक्रोश है, वहीं ईरान में जनता का एक वर्ग खुश है। इसका कारण यही है कि करीब 40 वर्षों से सत्ता पर काबिज रहने के दौरान उन्होंने निरंकुशता से शासन किया और अपने लोगों पर कठोर मजहबी मान्यताएं थोपीं। इसके अतिरिक्त उन्होंने हिजबुल्ला, हमास एवं हाउती जैसे संगठनों की हर तरह से मदद की। इससे इजरायल और अमेरिका का ईरान से का बैर बढ़ा। इसमें संदेह नहीं कि ईरान पर इजरायल और अमेरिका का हमला वैध नहीं
यह हमला कुल मिलाकर अमेरिका की मनमानी का ही परिचायक है, लेकिन जो स्थिति बनी उसके लिए ईरानी सत्ता की हठधर्मिता भी उत्तरदायी है। ईरान येन-केन -प्रकारेण परमाणु हथियार बनाने की जुगत में लगा हुआ था। यदि ईरानी सत्ता ने परमाणु हथियार कार्यक्रम को लेकर अड़ियल रुख का परिचय नहीं दिया होता तो संभवत: कूटनीतिक वार्ताओं के माध्यम से कोई हल निकल सकता था।
कहना कठिन है कि ईरान का भविष्य क्या है, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि एक समय आधुनिकता का वरण करने वाला यह देश पुरातनपंथी मजहबी कट्टरता में जकड़ गया था और इसी कारण ईरानी जनता के एक वर्ग के साथ पश्चिमी जगत में ईरानी शासन के प्रति विरोध बढ़ता जा रहा था।












