यह स्वागतयोग्य है कि देर से ही सही, दिल्ली और एनसीआर के सभी राज्यों ने वायु प्रदूषण से निपटने के लिए सतत रूप से सक्रिय रहने का निर्णय किया। इसके सकारात्मक परिणाम निकलने चाहिए, पर ऐसा तब होगा, जब दिल्ली संग एनसीआर के राज्य वास्तव में वर्ष भर वायु प्रदूषण की रोकथाम के लिए प्रयत्नशील रहेंगे। समझना कठिन है कि अभी तक इसकी आवश्यकता क्यों नहीं समझी गई?

अभी स्थिति यह है कि जब वायु प्रदूषण सिर उठा लेता है, तब अलग-अलग राज्य अपने-अपने स्तर पर उससे निपटने के लिए सक्रिय होते हैं। यह सक्रियता निष्प्रभावी ही रहती है। यह किसी से छिपा नहीं कि इन दिनों दिल्ली-एनसीआर वायु प्रदूषण से त्रस्त है और उससे निपटने के लिए जो भी उपाय किए जा रहे हैं, वे अपर्याप्त सिद्ध हो रहे हैं।

वायु प्रदूषण की गंभीर स्थिति के बीच दिल्ली एवं एनसीआर के राज्यों ने वायु की गुणवत्ता संभालने के लिए साल भर प्रदूषण रोधी उपायों पर काम करने के लिए अपनी जो योजना केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय और वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग को सौंपी है, उसके तहत सभी राज्य 15 जनवरी से वायु प्रदूषण पर लगाम लगाने का काम शुरू कर देंगे, जो वर्ष भर चलेंगे।

अच्छी बात यह है कि इन कामों की हर महीने समीक्षा होगी। इस सबके बावजूद प्रश्न यह है कि आखिर केवल दिल्ली एवं उससे सटे राज्य ही वायु प्रदूषण से पार पाने के लिए आगे क्यों आए हैं? यह कार्य तो हर राज्य और विशेष रूप से उत्तर भारत के सभी राज्यों को करना चाहिए।

अब वायु प्रदूषण केवल दिल्ली-एनसीआर की ही समस्या नहीं है, भले ही उसकी चर्चा अधिक होती हो। सच यह है कि अब सर्दियों में उत्तर भारत के करीब-करीब सभी राज्य वायु प्रदूषण से ग्रस्त रहने लगे हैं। इसी कारण भारत की गिनती उन देशों में होने लगी है, जहां की वायु सर्वाधिक प्रदूषित बनी रहती है। उचित यह होगा कि केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय देश के सभी राज्यों से वायु प्रदूषण से निपटने की ऐसी किसी योजना पर काम करने को कहे, जो वर्ष भर चलती रहे।

फिलहाल यह कहना कठिन है कि दिल्ली एवं एनसीआर के राज्यों ने वायु प्रदूषण से निपटने के लिए 12 महीने सक्रिय रहने की जो तैयारी की है, उसके कैसे नतीजे कब तक सामने आएंगे, लेकिन यह समझा जाए कि वायु प्रदूषण से मुक्ति तभी मिलेगी, जब आम जनता उसके प्रति सजग होगी और साथ ही अपना योगदान देने के लिए भी तत्पर रहेगी।

लोगों को अपने जनप्रतिनिधियों पर इसके लिए दबाव डालना होगा कि वे जानलेवा साबित होते वायु प्रदूषण को गंभीरता से लें। उन्हें नगर निकायों पर भी दबाव बनाना होगा, क्योंकि स्थानीय स्तर पर जिन कारणों से वायु प्रदूषण बढ़ता है, उनका निवारण करने में वे नाकाम ही हैं।