यह ठीक है कि खाने-पीने की सामग्री के साथ अन्य सामान की डिलीवरी करने वाले अस्थायी कामगारों यानी गिग वर्करों की ओर देश का ध्यान गया, लेकिन ऐसा तब हो पाया, जब विपरीत परिस्थितियों में काम करने वाले इन लोगों को हड़ताल करनी पड़ी। गिग वर्करों की मांगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार होना चाहिए, क्योंकि उनकी कार्यदशाएं काफी कठोर हैं।

आज जब क्विक कामर्स और फूड डिलीवरी कंपनियों का कारोबार बढ़ता जा रहा है, तब उनके लिए काम की बेहतर दशाएं सुनिश्चित की ही जानी चाहिए। यह संतोषजनक तो है कि केंद्र सरकार गिग वर्कर्स के लिए सामाजिक सुरक्षा का एक प्रस्ताव लेकर आई है, लेकिन बात तब बनेगी, जब इस प्रस्ताव के प्रविधानों को सही तरह लागू करने में सफलता मिलेगी। गिग वर्करों की समस्या यह है कि वे जिन कंपनियों के लिए काम करते हैं, उनके वे कर्मचारी नहीं माने जाते।

उनके काम के घंटे भी तय नहीं हैं। वे जितने समय काम करते हैं, उतने ही वक्त का उन्हें पैसा मिलता है। उन्हें कभी भी काम से हटाया जा सकता है। चूंकि उनकी स्थिति असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों जैसी है, इसलिए उनकी कार्यदशाओं पर किसी का ध्यान नहीं है। यदि उनके साथ कुछ अनहोनी जाए तो संबंधित कंपनी की जवाबदेही नहीं होती। यह समझा जाना चाहिए कि गिग वर्कर आधारित उद्योग बेहतर नियमन की मांग कर रहा है।

गिग वर्करों की समस्याएं इसलिए और बढ़ गई हैं, क्योंकि दस मिनट में भी सामान की डिलीवरी करने का चलन जोर पकड़ गया है। इस चलन पर फिर से विचार होना चाहिए, क्योंकि इससे गिग वर्करों के साथ दुर्घटनाएं होने का जोखिम बढ़ गया है। कई बार गिग वर्कर शीघ्र सामान पहुंचाने के फेर में ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करते दिखते हैं। निःसंदेह गिग वर्कर बढ़ रहे हैं, लेकिन उन्हें मिलने वाले मेहनताने को आकर्षक नहीं कहा जा सकता।

नीति आयोग के अनुसार 2020-21 में जो गिग वर्कर 77 लाख के करीब थे, उनकी संख्या 2029-30 तक 2.35 करोड़ हो जाएगी। ऐसे में सरकार के साथ उन कंपनियों को भी उनकी सुधि लेनी होगी, जिनके लिए वे काम करते हैं। उन्हें केवल सामाजिक सुरक्षा के ही दायरे में नहीं लाया जाना चाहिए, बल्कि ऐसे उपाय भी किए जाने चाहिए, जिससे उनका शोषण न हो सके और वे अपने भरणपोषण लायक आय अर्जित कर सकें।

अब जब यह स्पष्ट है कि आने वाले समय में गिग वर्करों की संख्या बढ़ती ही जानी है, तब इस पर भी ध्यान दिया जाए कि सामान की डिलीवरी के लिए बैट्री चालित दोपहिया वाहनों का ही उपयोग हो। यह भी समय की मांग है कि गिग वर्करों के साथ असंगठित क्षेत्र के अन्य सभी कामगारों के हित की भी चिंता की जाए। यह ठीक नहीं कि लाखों अस्थायी कामगार सामाजिक सुरक्षा के दायरे से बाहर हैं।