संपादकीय: मनरेगा में भ्रष्टाचार, निर्धन तबके के लोगों को रोजगार देने के नाम पर हो रही थी लूट
ग्रामीण विकास मंत्रालय के आंतरिक ऑडिट में मनरेगा में बड़े भ्रष्टाचार का खुलासा हुआ है। चालू वित्त वर्ष में 55 जिलों में 11 लाख से अधिक वित्तीय गड़बड़ियाँ पकड़ी गईं, जिनमें 300 करोड़ रुपये से अधिक की हेराफेरी शामिल है। यह दर्शाता है कि गरीबों को रोजगार देने के नाम पर बड़े पैमाने पर लूट हो रही थी, जिसमें ठेकेदार, अधिकारी और बैंक मैनेजर तक शामिल थे। केंद्र सरकार के नए स्वरूप में पारदर्शिता पर जोर है, लेकिन राज्यों को भी गंभीरता दिखानी होगी।
HighLights
ग्रामीण विकास मंत्रालय के आंतरिक आडिट के चलते मनरेगा में भ्रष्टाचार के जैसे मामले सामने आए, वे चौंकाने वाले हैं। चालू वित्त वर्ष में देश के केवल 55 जिलों में कराए गए ऑडिट में वित्तीय गड़बड़ी के 11 लाख से ज्यादा मामले पकड़े गए, जिनमें 300 करोड़ रुपये से अधिक की हेराफेरी हुई। कोई भी अनुमान लगा सकता है कि जब केवल 55 जिलों में आठ माह में मनरेगा के तहत कराए गए कामों में इतनी गड़बड़ी देखने को मिली तो देश भर के सात सौ से अधिक जिलों में क्या स्थिति होगी?
साफ है कि निर्धन तबके के लोगों को रोजगार देने के नाम पर लूट हो रही थी और कोई उसे रोकने वाला नहीं था। जिस तरह यह सामने आया कि जन कल्याण के नाम पर हो रहे भ्रष्टाचार में ठेकेदार, अधिकारी से लेकर बैंक मैनेजर तक शामिल थे, उससे यही स्पष्ट होता है कि सरकारी धन के बंदरबाट का एक तंत्र विकसित हो गया था।
हालांकि रह-रहकर ऐसे सवाल उठते थे कि आखिर मरनेगा के तहत बुनियादी विकास के कितने ठोस काम हो रहे हैं, लेकिन उन पर कभी ध्यान नहीं दिया गया? इसी तरह इस सवाल का भी जवाब नहीं दिया गया कि रोजगार के नाम पर कब तक गड्ढे खोदे और भरे जाते रहेंगे? ऐसे सवालों के जवाब मांगने वालों को प्रायः यह सुनने को मिलता था कि उन्हें गरीबों के उत्थान की योजना रास नहीं आ रही है।
कई बार तो मनरेगा में किसी तरह के बदलाव के सुझाव को इसलिए अनदेखा कर दिया जाता था कि इस योजना में महात्मा गांधी का नाम जुड़ा था। अभी हाल में जब मोदी सरकार ने इस योजना के नाम के साथ उसके रूप-स्वरूप में भी बदलाव किया तो विरोध में यह भी कहा गया कि इस सरकार को गांधी जी के नाम से बैर है। स्वाभाविक रूप से कांग्रेस एवं अन्य विपक्षी दलों ने सबसे अधिक विरोध किया, लेकिन उनके पास भ्रष्टाचार संबंधी सवालों का कोई जवाब नहीं था।
कहीं ऐसा तो नहीं कि राज्य सरकारें मनरेगा में व्याप्त भ्रष्टाचार की इसलिए अनदेखी कर रही थीं कि इस योजना के तहत केंद्र सरकार का अंशदान 90 प्रतिशत था? सच जो भी हो, इसकी अनदेखी न की जाए कि आम तौर पर राज्य सरकारें उन योजनाओं के क्रियान्वयन में गंभीरता नहीं दिखातीं, जिनका पैसा केंद्र से मिलता है। ऐसी योजनाएं भ्रष्टाचार का भी शिकार अधिक होती हैं।
अपने देश में विभिन्न सरकारी योजनाओं के तहत कागजों पर काम दिखाकर उसका पैसा हड़प लेना एक पुरानी बीमारी है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस बीमारी से छुटकारा नहीं मिल पा रहा है। यह ठीक है कि मनरेगा के नए स्वरूप वीबी-जीरामजी के तहत केंद्र सरकार ने भुगतान में पारदर्शिता के साथ ठोस बुनियादी कामों पर जोर दिया है, लेकिन उसके साथ राज्यों को भी सुनिश्चित करना होगा कि वास्तव में ऐसा ही हो।














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