बजट के बाद ‘विकसित भारत के लिए प्रौद्योगिकी, सुधार एवं वित्त’ विषय एक वेबिनार को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने यह जो कहा कि भारतीय कंपनियों को नए निवेश एवं नवाचार के साथ आगे आना चाहिए, उस पर उन्हें सकारात्मकता के साथ अपनी सक्रियता का परिचय देना चाहिए। प्रधानमंत्री ने उद्योग जगत से बजट घोषणाओं का लाभ उठाने का आग्रह भी किया। कायदे से तो ऐसे किसी आग्रह की आवश्यकता ही नहीं पड़नी चाहिए।

उद्योग जगत को स्वतः सक्रिय हो जाना चाहिए। यह पहली बार नहीं, जब प्रधानमंत्री ने उद्योग जगत को नवाचार के जरिये अपनी क्षमता प्रदर्शित करने को कहा हो। वे इसके साथ ही यह भी कहते रहे हैं कि उद्योग जगत को वैश्विक प्रतिस्पर्धा का सामना करने में सक्षम बनना चाहिए और शोध एवं विकास में निवेश करना चाहिए।

विडंबना यह है कि हमारे ऐसे बड़े कारोबारी भी यह काम नहीं कर रहे हैं, जिनके पास पूंजी की कोई कमी नहीं। वे नवाचार के नाम पर ऐसे नए काम अधिक हाथ में लेते हैं, जिनसे कम समय में आसानी से धन अर्जित किया जा सके। यही कारण है कि वे ऐसे कोई उत्पाद तैयार नहीं कर पा रहे हैं, जिनकी देश के साथ दुनिया में भी मांग हो।

यह सामान्य बात नहीं कि चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाने के बाद भी चंद भारतीय उत्पाद ही ऐसे हैं, जिनकी विश्व में थोड़ी-बहुत पहचान और प्रतिष्ठा है। यह भी किसी से छिपा नहीं कि भारतीय उद्योग जगत शोध एवं विकास में पैसा खर्च न कर पाने के कारण न तो चीनी उत्पादों का मुकाबला कर पा रहे हैं और न ही अपने उत्पाद विश्व बाजार में आसानी से खपा पा रहे हैं। जहां चीन में उद्योग जगत आर्थिक विकास का नेतृत्व करते दिखता है, वहीं भारत में कारोबारी सरकार के प्रोत्साहन पर भी तत्परता नहीं दिखाते।

एक-दो कारोबारी समूहों को छोड़ दिया जाए तो आम तौर पर हमारे कारोबारी वैश्विक स्तर की उत्पादकता हासिल करने के लिए सक्रिय नहीं। वे अपने उत्पादों की गुणवत्ता भी विश्वस्तरीय बनाने के लिए उत्साही नहीं हैं। एक ऐसे समय जब सरकार एक के बाद एक देशों से मुक्त व्यापार समझौते कर रही हैं और इसके चलते शीघ्र ही कई विकसित देशों के बाजार भी भारतीय उद्योग जगत की पहुंच में होंगे, तब तो उन्हें इन समझौतों का पूरा लाभ उठाने के लिए कमर कसनी ही चाहिए। इसलिए और भी, क्योंकि सरकार प्रक्रियाओं को सरल बनाने के साथ कारोबारी सुगमता बढ़ाने के लिए निरंतर प्रयत्न कर रही है।

उचित यह होगा कि प्रधानमंत्री ने सरकार, उद्योग जगत, वित्तीय संस्थानों और शिक्षाविदों के बीच सहयोग स्थापित करने वाले जिस ‘रिफार्म पार्टनरशिप चार्टर’ की बात की, उस पर गंभीरता से काम हो, ताकि वह विकसित भारत की मजबूत आधारशिला बन सके।