अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने जिस तरह यह कहा कि वेनेजुएला अमेरिका को पांच करोड़ बैरल तेल देगा और उसकी बिक्री वे खुद करेंगे, वह उनकी मनमानी का एक और शर्मनाक उदाहरण है। इससे यही सिद्ध होता है कि वेनेजुएला पर अमेरिकी सेनाओं के हमले का मूल उद्देश्य इस देश के तेल संसाधन पर कब्जा करना ही था। वे इस कब्जे को लेकर जिस तरह कोई शर्म-संकोच नहीं कर रहे हैं, उससे यही पता चलता है कि उन्हें अंतरराष्ट्रीय नियम-कानूनों की कोई परवाह नहीं।

वे सैन्य शक्ति के मद में चूर होकर यह देखने से भी इन्कार कर रहे हैं कि उनकी अराजकता किस तरह विश्व को संकट की ओर धकेल रही है। वे अपनी हरकतों से विश्व के दबंग देशों को मनमानी करने का लाइसेंस दे रहे हैं। उनके रवैये से विश्व में उथलपुथल मच सकती है और कुछ नए युद्ध भी छिड़ सकते हैं। खुद को शांति का मसीहा बताने और इसी बहाने नोबेल पुरस्कार की चाह रखने वाले ट्रंप दुनिया को अशांत और अस्थिर करने का काम जिस बेशर्मी से कर रहे हैं, वह उन्हें भी महंगा पड़ सकता है, क्योंकि एक के बाद एक देश उनसे आजिज आ रहे हैं।

उन्होंने जिस तरह डेनमार्क के अर्द्ध स्वायत्त क्षेत्र ग्रीनलैंड पर बलपूर्वक कब्जा करने की धमकी दी, उसके बाद वे यूरोपीय देश भी उनसे खफा हैं, जो हर बात में उनकी हां में हां मिलाते थे। अब इन देशों को यह समझ आ जाए तो अच्छा कि अहंकारी ट्रंप अपने मित्र देशों के भी सगे नहीं। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि ट्रंप कूटनीतिक शिष्टाचार को धता बताकर भारतीय प्रधानमंत्री समेत अन्य अनेक शासनाध्यक्षों पर तंज कस रहे हैं।

उनके बड़बोलेपन से यह नहीं लगता कि निकट भविष्य में भारत और अमेरिका के बीच कोई व्यापार समझौता हो पाएगा। ट्रंप भले ही ड्रग्स तस्करी पर रोक लगाने और लोकतांत्रिक शक्तियों को बल देने की आड़ ले रहे हों, लेकिन उनकी मनमानी का मूल कारण डालर के प्रभुत्व को कायम रखना है। डालर के दबदबे के पीछे एक बड़ी भूमिका तेल व्यापार में अमेरिकी मुद्रा का चलन है। चूंकि अमेरिका एक लंबे समय से मनमानी करता चला आ रहा है, इसलिए विश्व के देशों ने डालर से दूरी बनानी शुरू की।

जब इराक और लीबिया ने ऐसा किया तो उन पर हमला किया गया। वेनेजुएला ने भी डालर के बजाय अन्य मुद्राओं में तेल बेचना शुरू कर दिया था। हालांकि तेल बिक्री-खरीद में रूस और चीन भी डालर से परहेज कर रहे हैं, लेकिन ट्रंप का इन देशों पर जोर नहीं, इसलिए वे कमजोर देशों को अपना निशाना बना रहे हैं। वे यह नहीं देख पा रहे कि उनके अराजक रवैये से डालर का वर्चस्व कायम नहीं रहने वाला, क्योंकि उनकी दादागीरी विश्व को डालर में व्यापार न करने के लिए ही विवश कर रही है।