अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान में सैन्य हस्तक्षेप करने के जो नए संकेत दिए, उससे यह स्पष्ट है कि वेनेजुएला पर हमले के बाद वे पूरी तरह से बेलगाम हो गए हैं। उनका मनमानापन इसलिए बढ़ता चला जा रहा है, क्योंकि वेनेजुएला में अमेरिकी सेनाओं के हमले का विश्व समुदाय की ओर से एक सुर में विरोध और प्रतिरोध नहीं हुआ। चार वर्ष पहले जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया था तो अमेरिका और उसके सहयोगी राष्ट्रों ने उस पर अंतरराष्ट्रीय नियम-कानूनों की अनदेखी करने के आरोप लगाए थे।

पिछले चार वर्षों में ये आरोप लगातार दोहराए गए हैं, लेकिन अब ट्रंप रूसी राष्ट्रपति पुतिन की ही तरह मनमानी कर रहे हैं। स्पष्ट है कि उनका रवैया विश्व को और अधिक अस्थिर एवं अशांत करने वाला ही है। यह सही है कि ईरान की कट्टरपंथी इस्लामी सत्ता के खिलाफ वहां के लोग सड़कों पर हैं और उनके प्रति सख्ती दिखाई जा रही है, लेकिन यह स्थिति अमेरिका अथवा किसी अन्य देश को वहां पर सैन्य हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं देती।

यदि ईरान में किसी तरह के हस्तक्षेप की आवश्यकता है तो उसकी पूर्ति संयुक्त राष्ट्र की सहमति से और उसके नेतृत्व में ही होनी चाहिए। इसी के साथ यह भी आवश्यक है कि ईरानी शासक और विशेष रूप से वहां की सत्ता का संचालन कर रहे सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई यह समझें कि अपने लोगों का दमन करके स्थितियों को नहीं सुधारा जा सकता।

ईरान के लोग जिन कारणों से सड़कों पर हैं, उनकी अनदेखी नहीं की जा सकती। वे बढ़ती महंगाई से बुरी तरह त्रस्त हैं। ईरान की आर्थिक स्थिति इसलिए गड़बड़ाई हुई है, क्योंकि अमेरिका ने इस आधार पर उस पर कठोर प्रतिबंध लगा रखे हैं कि वह परमाणु हथियार बनाने की चेष्टा कर रहा है। ईरान की ऐसी किसी चेष्टा से इजरायल भी सशंकित है और कुछ महीनों पहले इसी कारण उसने वहां पर हमला भी किया था।

इस हमले में अमेरिका ने भी इजरायल का साथ दिया था। एक बार फिर अमेरिका और इजरायल ईरान की घेराबंदी करें तो हैरानी नहीं, लेकिन इससे पश्चिम एशिया की स्थितियां और अधिक बिगड़ेंगी। ईरान अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते पहले ही आर्थिक रूप से पस्त है। विडंबना यह है कि इसके बावजूद वह हिजबुल्ला, हमास जैसे संगठनों के साथ-साथ यमन में काबिज हाउती विद्रोहियों को आर्थिक एवं सैन्य सहायता देने में लगा हुआ है।

स्वाभाविक रूप से ईरान की जनता इसके भी खिलाफ है। यदि ईरानी सत्ता अमेरिकी हस्तक्षेप से बचना चाहती है तो उसे अपने रवैये में परिवर्तन करना होगा। पता नहीं ऐसा होगा या नहीं, लेकिन भारत को ईरान के बिगड़ते हालात के प्रति सतर्क रहना होगा, क्योंकि वहां उसके व्यापक हित निहित हैं।