वेनेजुएला पर हमला करने और डेनमार्क के स्वायत्तशासी क्षेत्र ग्रीनलैंड पर बलपूर्वक कब्जा करने की धमकी देने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और अधिक बेलगाम हो गए हैं। अब उन्होंने एक ऐसे विधेयक को सहमति प्रदान की, जिसके तहत रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर अमेरिका 500 प्रतिशत टैरिफ थोपेगा।

चूंकि रूस से तेल खरीदने वाले प्रमुख देश चीन, भारत और ब्राजील हैं, इसलिए इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता कि वे इस मनमानी मान्यता से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं कि रूस से तेल खरीदने वाले देश ही उसे यूक्रेन के खिलाफ युद्ध जारी रखने में सहायक हैं। ट्रंप ने भारत पर पहले से ही 50 प्रतिशत टैरिफ लगा रखा है। इसमें और अधिक वृद्धि का मतलब है आर्थिक प्रतिबंध लगाना।

ट्रंप किस तरह मनमानी पर उतर आए हैं, इसका एक प्रमाण उनकी ओर से 60 से अधिक अंतरराष्ट्रीय संगठनों से अमेरिका को अलग करना भी है। इनमें भारत के नेतृत्व वाला अंतरराष्ट्रीय सौर सहयोग संगठन भी है। अमेरिका ने जिन संगठनों से खुद को अलग करने की घोषणा की है, उनमें करीब 30 संयुक्त राष्ट्र के हैं। ट्रंप इसके पहले भी अनेक महत्वपूर्ण वैश्विक संस्थानों से अमेरिका को अलग कर चुके हैं। अब उन्होंने जिस तरह थोक में कई संगठनों से बाहर आने का फैसला किया, उससे यही स्पष्ट हो रहा है कि वे विश्व व्यवस्था को पूरी तौर पर छिन्न-भिन्न करना चाहते हैं।

ट्रंप अपने मनमानेपन से दुनिया को शीत युद्ध के दौर में ही नहीं, बल्कि उसके पहले के उस कालखंड में ले जा रहे हैं, जब विश्व व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं थी। यदि ट्रंप यह सोच रहे हैं कि दुनिया उनकी धमकियों और सनक भरे फैसलों के समक्ष झुक जाएगी तो ऐसा होने वाला नहीं है। ध्यान रहे कि अब यूरोप भी उनके खिलाफ आवाज उठाने को बाध्य है।

ट्रंप कितना ही गर्जन-तर्जन करें, आज अमेरिका की वैसी हैसियत नहीं, जैसी दो-तीन दशक पहले हुआ करती थी। अब डालर का वर्चस्व भी कम हो रहा है। ट्रंप को यह आभास होना चाहिए कि वे तमाम जोर लगाने के बावजूद यूक्रेन पर रूस के हमले रोक पाने में नाकाम हैं। चीन और ब्राजील पर भी उनका जोर नहीं चल पा रहा है और भारत का भी यही स्पष्ट संदेश है कि वह उनके दबाव में झुकने वाला नहीं।

इसी कारण ट्रंप की भारत के प्रति बौखलाहट बढ़ती जा रही है। आने वाले दिनों में भारत-अमेरिका संबंध और अधिक खराब हो सकते हैं। भारत को अब यह और अच्छे से स्पष्ट करना होगा कि वह ट्रंप की मनमानी सहन करने वाला नहीं। उसे अमेरिका को यह संदेश देने के साथ ही यह भी देखना होगा कि विश्व के प्रमुख राष्ट्रों से मिलकर कैसे ट्रंप की दादागीरी का सामना किया जाए, क्योंकि अब इसके अलावा और कोई उपाय नहीं रह गया है।